देहरादून. बजट को लेकर पूर्व सीएम हरीश रावत ने भाजपा पर करारा हमला बोला है. हरीश रावत ने कहा, निर्मला सीतारमण का यह जो 9वां बजट है. यह 2047 के विकसित भारत का नक्शा खींचते-खींचते ग्रामीण भारत को भूल गया है, कृषि को भूल गया है, लघु उद्योग को भूल गया है, यह तीनों सेक्टर्स के एलोकेशन को देखिए तो इनकी वृद्धि रक्षा, रक्षा राष्ट्रीय आवश्यकता है. ट्रांसपोर्ट या दूसरे सेक्टर्स के मुकाबले बहुत कम दिखाई देती है. इसका अर्थ है कि ग्रामीण रोजगार घटेंगे, छोटे उद्योग जिस स्थिति में थे उनके सामने और अपने को मजबूत करने का इस बजट में कोई प्रयास या कोई उनको प्रोत्साहन नहीं किया गया है.

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आगे हरीश रावत ने कहा, छोटे रोजगार के अवसर घटेंगे, AI और दूसरे क्षेत्रों के कारण यह अलग बात है कि नई संभावनाएं पैदा होंगी, लेकिन वह नई संभावनाएं सामान्य कामों को, सामान्य दर्जे के रोजगारों को कम करने का काम करेंगी, तो बेरोजगारी इससे बढ़ेगी. पर्यटन के क्षेत्र में जरूर जो है बौद्धिक, क्षैतिज आदि पर जोर दिया गया है और हिमालयी क्षेत्रों के लिए भी उत्तराखंड, हिमाचल आदि के लिए ट्रैकिंग हब बनाने की बात कही गई है. मगर ईको-टूरिज़्म के जो दूसरे पहलू हैं उन पर फोकस करने की बात और उसके लिए पूंजीगत निवेश की जरूरत थी, उस दिशा में इस बजट में कुछ कहा नहीं गया है तो इसका अर्थ है कि हिमालयी राज्यों को भी कुछ विशेष नहीं मिलने जा रहा है.

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आगे उन्होंने कहा, हम उम्मीद कर रहे थे कि हमको ग्रीन बोनस मिलेगा. हम उम्मीद कर रहे थे कि हमारे इन अंचलों के मध्य हिमालयी क्षेत्रों के कृषकों को विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों को जहां जंगलों का घनत्व ज्यादा है. जहां लोग बागवानी और दूसरी चीजों को प्रोत्साहित करते हैं उनको सीधे-सीधे कार्बन क्रेडिट स्कीम के साथ जोड़ा जाएगा, बजट में ऐसा कुछ नहीं कहा गया है. मैं एक निम्न मध्यम वर्ग या मध्यम वर्ग की ओर बढ़ता हुआ यदि व्यक्ति हूं, परिवार हूं तो मेरे ऊपर जो शिक्षा का बोझ है, बच्चों को मैं आज की कॉम्पिटिटिव शिक्षा के अंदर खड़ा कर सके और स्वास्थ्य की दिशा में जो बोझ है, क्योंकि स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होती जा रही हैं, शिक्षा महंगी होती जा रही है, इन दोनों के व्यय को वहन करना आज निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग की ओर बढ़ते हुए आमजन के लिए बड़ा कठिन हो गया है. उस कठिनाई को यह बजट कहीं पर भी एडजस्ट नहीं करता है.

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एक बड़ा क्षेत्र है असंगठित मजदूरों का, हम यह सोच रहे थे कि गिगवर्कर्स की बात बहुत दिनों से हो रही थी, तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए इस बजट में कोई स्कीम होगी उसके जरिए उनको प्रोत्साहित किया जा सके, उनकी आमदनी को बढ़ाया जा सके. वह केवल मजबूरी में जीवनयापन करने के बजाय जो है एक सुविधाजनक जिंदगी की ओर बढ़ सकें, उसके लिए इस बजट में किसी भी स्कीम का कोई जिक्र नहीं किया गया है. मैं समझता हूं कि आपदा को लेकर विशेष तौर पर क्लाइमेट चेंज का जो दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उसका सामना करने के लिए भी राज्यों को जिस तरीके से सक्षम करने की जरूरत थी और विशेष तौर पर मध्य हिमालयी राज्य जो सबसे ज्यादा आपदा से प्रभावित हो रहा है, उन राज्यों को किस तरीके से आप शक्ति देंगे! योजनाओं के जरिए, आर्थिक मदद के जरिए, उस विषय में भी यह बजट खामोश दिखाई दिया है तो कुल मिला करके यदि मैं कहूं तो यह बजट मुझको मध्य हिमालयी राज्य के एक नागरिक के रूप में भी और उत्तराखंड के नागरिक के रूप में भी और साथ-साथ देश के सामान्य जन के रूप में भी यह बजट निराश करता हुआ प्रतीत होता है.

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यह है कि रियल मिनरल्स आदि जो दूसरे क्षेत्रों की जो राष्ट्रीय आवश्यकताएं हैं उनको एडजस्ट करने की इस बजट में कोशिश की गई है, मिनरल कॉरिडोर आदि बनाकर के विशेष तौर पर ट्रांसपोर्टेशन पर फोकस किया गया है, वह कुछ क्षेत्र हैं जिनसे यह झलक मिलती है कि विकसित भारत की तरफ, लेकिन विकसित के लिए संसाधन जुटाने की दिशा के अंदर इस बजट में कहीं कुछ नहीं कहा गया है. मध्यम वर्ग को जो पिछले वर्ष एक राहत दी गई थी, हम यह सोच रहे थे कि जीएसटी के जरिए जिस तरीके से रीफोर्स किया गया है. मगर महंगाई ने अब जीएसटी की राहत को और पिछले बजट में दी गई राहत को भी समाप्त कर दिया है, यह महंगाई उस एवज में बढ़ गई है. इस बार हम उम्मीद कर रहे थे कि जो प्रक्रिया राहत देने की प्रत्यक्ष करों में है वह जारी रहेगी और लोगों को बचत के लिए इंसेंटिवाइज किया जाएगा, इंसेंटिवाइज करने में भी यह बजट चुप्पी साधे हुए दिखाई दे रहा है, तो मध्यम वर्ग के रूप में भी, सैलरी क्लास के रूप में भी यह बजट हमको निराश करता है.