देहरादून. नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने ऊर्जा विभाग में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए धामी सरकार पर हमला बोला है. उन्होंने कहा, ऊर्जा विभाग में सुनियोजित भ्रष्टाचार, जवाबदेही से भाग नहीं सकती सरकार. ऊर्जा विभाग में जिस प्रकार जुगाड़, हेराफेरी, भ्रष्टाचार और सुनियोजित षड्यंत्र के माध्यम से एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी को प्रबंध निदेशक (एम.डी.) के पद तक पहुंचाया गया. वह केवल एक अनियमित पदोन्नति नहीं, बल्कि पूरे शासन-प्रशासन की साख पर करारा तमाचा है. यह घटना साबित करती है कि विभाग में योग्यता, अनुभव और नियमों की नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण, सांठगांठ और मिलीभगत की चल रही है.
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आगे यशपाल आर्य ने कहा, प्रदेश को “ऊर्जा प्रदेश” बनाने के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन हकीकत यह है कि ऊर्जा विभाग को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया है. जब नियमों को रौंदकर शीर्ष पदों पर नियुक्तियां होंगी, तो परियोजनाएं लटकेंगी, लागत बढ़ेगी, वित्तीय अनुशासन ध्वस्त होगा और अंततः नुकसान जनता को उठाना पड़ेगा. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या बिना उच्च अधिकारियों, प्रभावशाली नौकरशाहों और राजनीतिक संरक्षण के कोई तृतीय श्रेणी कर्मचारी सीधे प्रबंध निदेशक की कुर्सी तक पहुँच सकता है? यदि नहीं, तो फिर असली दोषी कौन हैं? स्पष्ट है कि यह पूरा खेल ऊपर से नीचे तक संरक्षित रहा है. केवल एक व्यक्ति को बलि का बकरा बनाकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती.
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आगे उन्होंने कहा, पिछले वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र की परियोजनाओं में निविदा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी, लागत में असामान्य वृद्धि, मनमाने वित्तीय निर्णय और संदिग्ध ठेकों के आवंटन जैसे अनेक गंभीर आरोप सामने आए हैं. क्या इन सबकी डोर इसी संरक्षण तंत्र से जुड़ी है? सरकार को इसका जवाब देना ही होगा. हम स्पष्ट मांग करते हैं कि संबंधित कर्मचारी की नियुक्ति से लेकर एम.डी. पद तक की पूरी सेवा यात्रा की न्यायिक या उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच हो. पदोन्नति प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और कार्मिक विभाग की भूमिका की विस्तृत पड़ताल होनी चाहिए. इस अवधि में लिए गए सभी बड़े वित्तीय और नीतिगत निर्णयों का विशेष ऑडिट होना चाहिए. दोषी अधिकारियों और संरक्षण देने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए.
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यशपाल आर्य ने ये भी कहा कि यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता और सुशासन में विश्वास रखती है, तो उसे समयबद्ध जांच की घोषणा कर दोषियों को बेनकाब करना चाहिए. अन्यथा यह माना जाएगा कि पूरा तंत्र भ्रष्टाचार को संरक्षण देने में सहभागी है. ऊर्जा विभाग प्रदेश की आर्थिक रीढ़ है. यहां का भ्रष्टाचार केवल सरकारी खजाने को नहीं लूटता, बल्कि निवेशकों का विश्वास तोड़ता है, विकास की गति रोकता है और जनता की मेहनत की कमाई पर डाका डालता है. अब समय आ गया है या तो सरकार “ऊर्जा प्रदेश” के नाम पर चल रहे इस भ्रष्ट खेल को खत्म करे या फिर जनता के सामने स्वीकार करे कि वह भ्रष्टाचार पर मौन सहमति दे चुकी है.
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