उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज कहा कि भारत का ग्लोबल पॉवर के रूप में उदय उसकी बौद्धिक और सांस्कृतिक गरिमा के उत्थान के साथ होना चाहिए. यह बहुत ही अहम चीजें हैं, क्योंकि ऐसा उदय ही टिकाऊ होता है और हमारी परंपराओं के अनुकूल होता है. एक राष्ट्र की शक्ति उसकी सोच की मौलिकता, मूल्यों की कालातीतता और बौद्धिक परंपरा की दृढ़ता में निहित होती है. यही सॉफ्ट पावर (सांस्कृतिक प्रभाव) है जो दीर्घकालिक होता है और आज की दुनिया में अत्यंत प्रभावशाली है.
औपनिवेशिक मानसिकता से परे भारत की पहचान को फिर से स्थापित करने की बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “भारत महज 20वीं सदी के मध्य में बना राजनीतिक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह एक सतत सभ्यता है, चेतना, जिज्ञासा और ज्ञान की प्रवाहित नदी है.”
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औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और भारत की पहचान
उपराष्ट्रपति ने भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) पर पहले सालाना सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि भारत केवल 20वीं सदी के मध्य में बना राजनीतिक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह चेतना, जिज्ञासा और ज्ञान की एक सतत सभ्यता है। उन्होंने औपनिवेशिक मानसिकता से परे भारत की पहचान को फिर से स्थापित करने का आह्वान किया।
धनखड़ ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि देशज विचारों को केवल आदिम और पिछड़ेपन का प्रतीक मानकर खारिज करना एक ऐतिहासिक भूल थी। उन्होंने कहा, “यह मिटाने, नष्ट करने और विकृत करने की वास्तुकला थी। और अधिक दुखद यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी यह एकतरफा स्मरण चलता रहा। पश्चिमी मान्यताओं को सार्वभौमिक सत्य के रूप में पेश किया गया। साफ शब्दों में कहें तो ‘असत्य को सत्य के रूप में सजाया गया’।” उन्होंने सवाल किया कि हम अपनी मूल मान्यताओं को कैसे भूल सकते हैं, जो हमारी बुनियादी प्राथमिकता होनी चाहिए थी।
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उपराष्ट्रपति ने भारत की बौद्धिक यात्रा में आए दो प्रमुख व्यवधानों को रेखांकित किया:
इस्लामी आक्रमण: उन्होंने कहा कि इसने भारतीय विद्या परंपरा में पहला व्यवधान डाला, जहां समावेशन की बजाय तिरस्कार और विध्वंस का मार्ग अपनाया गया।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद: इसे दूसरा व्यवधान बताते हुए उन्होंने कहा कि इसने भारतीय ज्ञान प्रणाली को पंगु बना दिया, उसकी दिशा बदल दी। “विद्या के केंद्रों का उद्देश्य बदल गया, दिशा भ्रमित हो गई। ऋषियों की धरती बाबुओं की भूमि बन गई। ईस्ट इंडिया कंपनी को ‘ब्राउन बाबू’ चाहिए थे, राष्ट्र को विचारक।”
धनखड़ ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि हमने सोचना, चिंतन करना, लेखन और दर्शन करना छोड़ दिया और रटना, दोहराना और निगलना शुरू कर दिया। ग्रेड्स (अंक) ने चिंतनशील सोच का स्थान ले लिया और भारतीय विद्या परंपरा तथा उससे जुड़े संस्थानों को सुनियोजित ढंग से नष्ट किया गया।
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भारत के प्राचीन ज्ञान केंद्र और ज्ञान का व्यापक स्वरूप
उपराष्ट्रपति ने याद दिलाया कि जब यूरोप की यूनिवर्सिटी भी अस्तित्व में नहीं थीं, तब भारत की विश्वविख्यात विश्वविद्यालयें – तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और ओदंतपुरी – ज्ञान के महान केंद्र के रूप में स्थापित थीं। इन विश्वविद्यालयों में विशाल पुस्तकालयें थीं और वे वैश्विक केंद्र थे जहां कोरिया, चीन, तिब्बत और फारस जैसे देशों से भी विद्यार्थी आते थे।
उन्होंने ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित न मानने का आह्वान किया। धनखड़ ने कहा, “ज्ञान केवल ग्रंथों में नहीं होता बल्कि यह समुदायों में, परंपराओं में, और पीढ़ियों से हस्तांतरित अनुभव में भी जीवित रहता है।” उन्होंने जोर दिया कि एक सच्ची भारतीय ज्ञान प्रणाली को शोध में ग्रंथ और अनुभव दोनों को समान महत्व देना होगा, क्योंकि संदर्भ और सजीवता से ही सच्चा ज्ञान उत्पन्न होता है।
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आगे के लिए व्यावहारिक कदम और भविष्य की प्रासंगिकता
उपराष्ट्रपति ने तत्काल व्यावहारिक कदमों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत, तमिल, पाली, प्राकृत आदि सभी शास्त्रीय भाषाओं के ग्रंथों के डिजिटलीकरण की तत्काल व्यवस्था होनी चाहिए ताकि यह सामग्री शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए सार्वभौमिक रूप से सुलभ हो सके। साथ ही, युवाओं को शोध की ठोस विधियों से लैस करने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम भी जरूरी हैं, जिसमें दर्शन, गणना और तुलनात्मक अध्ययन शामिल हों।
उपराष्ट्रपति ने प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर का जिक्र करते हुए कहा कि यदि उनसे पूछा जाए कि मानव मस्तिष्क ने अपने कुछ सबसे उत्कृष्ट विचारों को कहाँ जन्म दिया, तो वह भारत की ओर इशारा करेंगे। धनखड़ ने कहा, “यह एक सनातन सत्य का उद्घोष था।”
अंत में, उन्होंने परंपरा और नवाचार के बीच संबंध पर प्रकाश डाला, यह कहते हुए कि अतीत की ज्ञान-परंपरा नवाचार की विरोधी नहीं, बल्कि प्रेरक होती है। उन्होंने ऋग्वेद के ब्रह्मांड संबंधी मंत्रों और चरक संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों की आज के संदर्भ में प्रासंगिकता पर जोर दिया। धनखड़ ने कहा कि आज की विभाजित और संघर्षपूर्ण दुनिया में, भारत की वह ज्ञान परंपरा जो आत्मा और जगत, कर्तव्य और परिणाम, मन और पदार्थ के बीच संबंधों पर हजारों वर्षों से चिंतन करती रही है, एक समावेशी और दीर्घकालिक समाधान के रूप में पुनः प्रासंगिक हो उठती है।
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