कौन थे कमाल मौला? जिनके नाम पर राजा भोज की भोजशाला को बना दिया गया था दरगाह

हाई कोर्ट ने लंबे समय से चले आ रहे भोजशाला मंदिर कमाल मौला मस्जिद विवाद में एक बड़ा फैसला सुनाया है.

कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मूल रूप से एक हिंदू मंदिर के तौर पर मान्यता दे दी है.

यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट पर आधारित था.

इस फैसले के बाद एक बार फिर से सभी का ध्यान कमाल मौला की तरफ गया है. आइए जानते हैं कौन थे कमाल मौला.

कमालुद्दीन मालवी को कमाल मौला के नाम से जाना जाता था. 13वीं-14वीं सदी के दौरान वे चिश्ती संप्रदाय से जुड़े एक सूफी संत थे.

ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक वे प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य और समकालीन थे.

माना जाता है कि कमालुद्दीन दिल्ली से मालवा क्षेत्र की यात्रा पर निकले और धार में बस गए.

यहां उन्होंने लगभग चार दशकों तक इस्लामी शिक्षाओं और सूफी परंपराओं का प्रचार-प्रसार किया.

वक्त के साथ इस क्षेत्र में उनकी मौजूदगी भोजशाला परिसर के साथ गहराई से जुड़ गई.

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