Dharm Desk – गणेश जी के एक ऐसे प्राचीन स्वरूप की भी पूजा होती है, जिसमें उनका सिर हाथी का नहीं बल्कि मनुष्य का है? इस स्वरूप को आदि विनायक या नरमुख विनायक कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभिक या मूल और ‘नरमुख’ का अर्थ मनुष्य के मुख वाला होता है। यही स्वरूप भगवान गणेश की उस पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है, जिसमें माता पार्वती द्वारा बनाए गए बालक का भगवान शिव से सामना हुआ था।

बालक माता पार्वती ने बनाया था
इस प्रचलित कथा को तो हम सभी लोग जानते हैं। पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि माता पार्वती ने अपने कक्ष की रक्षा के लिए एक बालक की रचना की और उसे द्वार पर पहरा देने को कहा। जब भगवान शिव वहां पहुंचे तो बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। इससे शिव और बालक के बीच युद्ध हुआ। भगवान शिव ने उस बालक का सिर काट दिया। बाद में पार्वती के आग्रह पर बालक को पुनर्जीवित किया और हाथी का सिर लगाया गया। इसके बाद वही बालक गणेश, गणपति और विनायक के रूप में पूजित हुए।
इसी कथा में हाथी का सिर लगने से पहले के स्वरूप को कुछ परंपराओं में आदि विनायक या नरमुख विनायक के रूप में देखा जाता है । इसलिए आदि गणेश को केवल एक अलग नाम नहीं, बल्कि गणेश जी के मूल मानवीय स्वरूप से जोड़कर समझा जाता है।
तमिलनाडु में आज भी है आदि गणेश का मंदिर
आदि गणेश के इस स्वरूप का सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले के तिलथर्पणपुरी स्थित मुक्तीश्वर मंदिर है। यहां आदि विनायक की अलग प्रतिमा है, जिसमें भगवान गणेश को मनुष्य के मुख के साथ दिखाया है। उन्हें नरमुख विनायक भी कहा जाता है। यह स्वरूप सामान्य गणेश प्रतिमाओं से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें गजमुख के स्थान पर मानव मुख है।
मंदिर की कहानी अन्य विशेषता भी है
तिलथर्पणपुरी पितृ कर्म और तर्पण से जुड़े तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है। मंदिर परिसर में भगवान राम द्वारा पितरों के लिए तर्पण करने से जुड़ी परंपरा तथा पितृ लिंगों का भी उल्लेख मिलता है।
गणेश उत्सव में क्यों खास है यह स्वरूप
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, ये पर्व 14 सितंबर को शुरू हुआ। दस दिवसीय गणेश उत्सव के अंतिम दिनों में जब भक्त गणपति की पूजा, आरती और विसर्जन की तैयारियों में जुटे हैं, तब आदि विनायक की कथा गणेश जी के स्वरूप से जुड़े एक अलग धार्मिक पक्ष को सामने लाती है।
गणेश जी को सामान्यतः गजानन, गणपति, विनायक और विघ्नहर्ता जैसे नामों से पूजा जाता है। आदि विनायक की परंपरा यह बताती है कि गणेशजी के वर्तमान गजमुख स्वरूप से पहले के मानवीय स्वरूप की भी कुछ मंदिर परंपराओं में पूजा की जाती है। हालांकि आदि गणेश नाम और उनकी कथा का विवरण अलग-अलग पौराणिक और स्थानीय परंपराओं में भिन्न रूप मे है।



