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लेखक -वैभव बेमेतरिहा

 जब से बीके हरिप्रसाद ने – ”छत्तीसगढ़ के प्रभार से मुक्त हो रहा हूँ”- कहा है,  प्रदेश कांग्रेस कमेटी में बड़ी हलचल मच गई है. समीकरण बदलने और नए समीकरण बनने की चर्चा खूब हो रही है.

कार्यकर्ता से लेकर नेता एक-दूसरे बस यही पूछ रहे हैं क्या सच में हरिप्रसाद जी की छुट्टी हो गई, क्या सही में उन्होंने अब प्रभारी पद छोड़ दी. अगर ऐसा है तो हरिप्रसाद की जगह कौन ले रहा है, कौन सम्भालने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी?
प्रभारी प्रदेश के नेताओं की पसंद से तय होंगे या फिर आलाकमान खुद ही प्रभारी तय कर छत्तीसगढ़ भेज देंगे? इन सवालों से इन दिनों पीसीसी का हर हिस्सा गूंज रहा है. कुछ नेता सीधे पीसीसी अध्यक्ष से ही संपर्क साध जानकारी टटोल रहे हैं, कुछ नेता दिल्ली से टोह ले रहे है, तो कुछ तो मीडिया वालों की जरिये दिल्ली की खबर जुटाने में लगे हैं.
वैसे नए प्रभारी को लेकर स्थानीय स्तर पर दो नाम की चर्चा खूब हो रही है. एक मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का तो दूसरा महासचिव मुकुल वासनिक की. दिग्विजय के मंत्रिमंडल में काम कर चुके कई नेता उनके नाम पर सहमत बताए जा रहे हैं तो कई का मानना है कि गुटबाजी बढ़ जाएगी. मुकुक वासनिक को लेकर नेताओं के भीतर सक्रियता कम दिखती है.
मतलब इस नाम के साथ जोश कम ही नेता या कार्यकर्ताओं में चर्चा के वक़्त दिख रहा है. ऐसे में चर्चा राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नाम की भी है, जो कि इस समय गुजरात के प्रभारी हैं. वैसे इन सबके बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के नाम की भी है, जो कि कर्नाटक से ही आते हैं मतलब वहीं से जहां से हरिप्रसाद जी हैं.
हालांकि जयराम रमेश को भी हरिप्रसाद की तरह ही कर्नाटक में चुनाव के मद्देनजर वही फोकस रखने की संभावना ज्यादा दिख रही है. फिर भी जयराम रमेश के नाम पर चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि वे जल-जंगल-जमीन के मुद्दे पर बेहद मुखर रहे हैं, और छत्तीसगढ़ में वे केंद्रीय पर्यावरण मंत्री कई बार दौरे पर आए है. आदिवासियों के बीच में लोकप्रिय माने जाते हैं