Dharm Desk :- देश में विजयादशमी का पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में रामलीला का आयोजन और रावण दहन प्रमुख आकर्षण होते हैं। महाराष्ट्र में आपटा के पत्तों को सोने के रूप में बांटने की परंपरा निभाई जाती है, जबकि कई क्षेत्रों में शमी पूजन और शस्त्र पूजन किया जाता है। बात करते हैं कि महाराष्ट्र में दशहरे के अवसर पर आपटा के पत्तों को सोना मानकर बांटने के पीछे का क्या कारण है। इस साल विजयादशमी का पर्व 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाया जाएगा।

आपटा के पत्तों को सोना मानकर बांटने का कारण
विजयादशमी के दिन आपटा के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर एक-दूसरे को देने की परंपरा सदियों से प्रचलित है। इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से मिलकर आपटा के पत्ते भेंट करते हैं और उनके सुख, समृद्धि तथा खुशहाली की कामना करते है। मान्यता के अनुसार, महान ऋषि कौत्स ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरु वरतंतु को गुरु दक्षिणा देने की इच्छा जताई। गुरु ने उनसे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगीं। गुरु दक्षिणा की इतनी बड़ी राशि जुटाने के लिए कौत्स राजा रघु के पास पहुंचे। राजा रघु अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उस समय वह अपना समस्त धन दान कर चुके थे। इसके बावजूद कौत्स को निराश न लौटाने के लिए राजा रघु ने धन के देवता कुबेर से सहायता मांगी। लोककथा के अनुसार, इसके बाद आपटा और शमी के वृक्षों से जुड़ी स्वर्ण मुद्राओं की घटना हुई। कौत्स ने उन मुद्राओं से अपने गुरु को गुरु दक्षिणा दी और शेष धन लोगों में बांट दिया। इसी कथा को विजयादशमी पर आपटा के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर बांटने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

दशहरे पर आपटा के पत्ते देने का महत्व
धार्मिक मान्यताओं में सोने को धन, वैभव और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। ऐसे में विजयादशमी पर आपटा के पत्ते देना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक-दूसरे के जीवन में सुख, शांति और उन्नति की कामना करने का माध्यम भी है। महाराष्ट्र में लोग आपटा के पत्ते देते समय मराठी में ‘सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा’ कहते हैं। इसका भाव है कि सोना स्वीकार करें और सोने की तरह मूल्यवान बने रहें। इस परंपरा के माध्यम से लोग अपने संबंधों में प्रेम, सम्मान और सद्भाव बनाए रखने का संदेश देते हैं। इस रस्म की एक खास बात यह भी है कि इसमें किसी महंगे उपहार की आवश्यकता नहीं होती। आपटा का एक छोटा-सा पत्ता भी शुभकामनाओं, अपनत्व और मंगलकामना का प्रतीक बन जाता है।

शमी के पेड़ की पूजा का भी महत्व
विजयादशमी के अवसर पर शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शमी का संबंध साहस, शक्ति, सुरक्षा और विजय से है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष में छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद उन्होंने उसी वृक्ष से अपने हथियार वापस लिए और युद्ध में विजय प्राप्त की। इसी मान्यता के कारण शमी के वृक्ष को विजय और शौर्य का प्रतीक माना जाता है। दशहरे पर कई स्थानों पर शमी के वृक्ष का पूजन किया जाता है। वहीं, कुछ परंपराओं में शस्त्र पूजन और सीमोल्लंघन का भी विशेष महत्व है। इन धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से विजय, समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है।

देशभर में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है दशहरा
धार्मिक दृष्टि से विजयादशमी का संदेश अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय है। इस दिन लोग पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान करने के साथ अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं देते हैं। महाराष्ट्र की आपटा के पत्ते बांटने की परंपरा भी इसी मंगलभाव को दर्शाती है, जिसमें प्रतीकात्मक सोना देकर सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।