Dharm Desk – पितृपक्ष में श्राद्ध करने के दौरान सबसे महत्वपूर्ण सवालों में एक यह होता है कि पितरों के निमित्त तैयार किया गया भोजन आखिर ब्राह्मण को ही क्यों कराया जाता है? क्या इसकी वहज सिर्फ सदियों से चली आ रही परंपरा है या धर्मशास्त्रों में इसके पीछे कोई स्पष्ट आधार भी बताया गया है? खासकर जब श्राद्ध के दिनों में एक साथ कई परिवारों में कर्मकांड होते हैं और योग्य ब्राह्मण मिलना मुश्किल हो जाता है, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराने का शास्त्रीय आधार
मनुस्मृति में श्राद्ध के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराने का स्पष्ट उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि देवताओं और पितरों के लिए किए जाने वाले कर्म में श्रोत्रिय यानी वेद का अध्ययन करने वाले योग्य ब्राह्मण को अर्पण करना अधिक उचित है । आगे पितृयज्ञ में विद्वान व्यक्ति को भोजन कराने की बात कही गई है। इसका मतलब यह है कि श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराना केवल समान्य अतिथि-सत्कार नहीं है। शास्त्रीय व्यवस्था में उन्हें पितृकर्म के पात्र के रूप में देखा गया है। इसलिए श्राद्ध के भोजन में व्यक्ति की योग्यता को भी महत्व दिया है ।
यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि शास्त्रों में केवल जन्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को श्राद्ध का पात्र मान लेने की बात नहीं है । मनुस्मृति में वेद के अध्यन और आचरण से जुड़े गुणों वाले ब्राह्मण को श्राद्ध में भोजन कराने की विशेष प्रशंसा की गई है। याज्ञवल्क्य स्मृति में भी कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ और माता-पिता के प्रति समर्पित ब्राह्मणों को श्राद्ध के लिए योग्य बताया गया है । यानी श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन की परंपरा के पीछे पात्रता और धार्मिक आचरण को भी महत्व दिया गया है।
ब्राह्मण की पत्नी को अकेले भोजन करा सकते हैं?
श्राद्ध के मुख्य निमंत्रण के लिए ब्राह्मण को प्राथमिकता दी जाती है । यदि किसी परिवार में माता या पिता का श्राद्ध है और ब्राह्मण को आमंत्रित किया गया है, तो उनके साथ पत्नी या बच्चे आ जाएं तो उन्हें भोजन कराना अलग बात है, लेकिन केवल ब्राह्मण की पत्नी को बुलाकर उसे श्राद्ध का मुख्य पात्र मनना हर परंपरा में समान रूप से निर्धारित है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा।
ब्राह्मण न मिले तो क्या करें?
इस समय पितृपक्ष चल रहा है और कई जगह एक ही दिन बड़ी संख्या में श्राद्ध होने के करण ब्राह्मण मिलना कठिन हो सकता है। ऐसी स्थिति में सबसे पहले परिवार के पुरोहित या स्थानीय आचार्य से अपनी परिस्थिति बताकर विधि पूछना उचित है।
शास्त्रीय ग्रंथों में श्राद्ध के दौरान भोजन, जल, तर्पण और पितरों के निमित्त अर्पण का विस्तृत विधान मिलता है । इसलिए ब्राह्मण उपलब्ध न होने की स्थिति में बिना जानकारी के कोई दूसरा व्यक्ति बैठाकर कर्म पूरा घोषित करने के बजाय अपने कुलाचार के अनुसार उचित विकल्प जानना बेहतर रहेगा।
पात्र और विधि का भी महत्व
श्राद्ध का मूल भाव पितरों के प्रति श्रद्धा है, लेकिन इसके साथ शास्त्रों में बताए गए पात्र और विधि का भी महत्व रखा गया है, इस लिए ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा को केवल रिवाज कहकर छोड़ने के बजाय उसके पीछे बताए गए पात्रता और पितृकर्म के विधान को समझना जरूरी है।


