Dharm Desk – पितृ पक्ष की शुरुआत के साथ ही देश, दुनिया से लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान चलना शुरू कर देते हैं। इन सभी धार्मिक कर्मकांडों में बिहार का गया धाम सबसे प्रमुख स्थानों में गिना जाता है। हर साल पितृ पक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। फल्गु नदी के तट पर अपने पितरों के निमित्त विधि-विधान से कर्म करते है। गया में होने वाले पिंडदान को लेकर कई प्राचीन कथाएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं। जिनका उल्लेख विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। गया का धार्मिक महत्व केवल फल्गु नदी या विष्णुपद मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गयासुर की वह कथा भी है। जिसने इस स्थान को पितृ कर्म के लिए विशेष तीर्थ का स्वरूप दिया। इसी कथा में भगवान विष्णु के चरणचिह्न और गयासुर द्वारा मांगे गए उस वरदान का भी उल्लेख मिलता है, जिसे आज तक गया की धार्मिक पहचान से जोड़ा जाता है।

गयासुर ने कठोर तपस्या की थी
पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नाम के एक असुर ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि उसके दर्शन या स्पर्श मात्र से लोगों के पाप नष्ट हो जाएंगे।
इस वरदान के बाद बड़ी संख्या में लोग गयासुर के पास पहुंचने लगे। पाप करने के बाद उसके स्पर्श से पवित्र होने की यह परंपरा देवताओं के लिए चिंता का कारण बन गई। मान्यता है कि इससे यमलोक में जीवों के कर्मों का पूरा हिसाब प्रभावित होने लगा।
गयासुर का शरीर यज्ञ के लिए मांगा
इसके बाद देवताओं ने भगवान विष्णु से इसका समाधान करने का अनुरोध किया। भगवान विष्णु ने गयासुर से यज्ञ के लिए स्थान मांगा। उसका शरीर मांग लिया। गयासुर इसके लिए तैयार हो गया और पृथ्वी पर लेट गया। कथा के अनुसार, उसके शरीर को स्थिर रखने के लिए उसके ऊपर धर्मशिला रखी गई। जब वह भी स्थिर नहीं रही तो भगवान विष्णु ने स्वयं उस शिला पर अपना पैर रख दिया। इसी प्रसंग को गया में भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जोड़ा जाता है।
विष्णुपद मंदिर में है चरणचिह्न
गया का प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर इसी धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है। मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न के दर्शन होते है। इन चरणचिह्नों पर गदा, चक्र और शंख जैसे चिह्न भी बताए जाते हैं। मंदिर में चरणचिह्न का नियमित श्रृंगार किया जाता है। कथा के अनुसार, गयासुर ने भगवान विष्णु से अंतिम समय में वरदान मांगा कि उसका शरीर पृथ्वी पर सबसे पवित्र स्थान बने और यहां अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान करने वाले लोगों के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो। भगवान विष्णु ने उसका यह अनुरोध स्वीकार किया।
भगवान राम से भी जुड़ी है पिंडदान की परंपरा
गया की पितृ परंपरा से भगवान राम और माता सीता की कथा भी जोड़ी जाती है। मान्यता है कि भगवान राम ने फल्गु नदी के किनारे अपने पिता राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। इसी वजह से गया में फल्गु नदी का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है ।
अहिल्याबाई होलकर ने कराया था मंदिर का निर्माण
वर्तमान विष्णुपद मंदिर का निर्माण करीब ढाई सौ वर्ष पहले इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराए जाने का उल्लेख मिलता है। आज यह मंदिर गया के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। पितृ पक्ष के दौरान गया में लगने वाला मेला देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है । फल्गु नदी सहित यहां के अलग-अलग वेदियों और धार्मिक स्थलों पर पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है। यही वजह है कि गया को पितृ कर्म और पिंडदान से जुड़े प्रमुख तीर्थों में विशेष स्थान प्राप्त है।


