World Wetlands Day : अमित पांडेय, खैरागढ़। 2 फरवरी को पूरी दुनिया में विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि पानी, प्रकृति और जीवन के आपसी संबंधों को समझने और उन्हें बचाने का वैश्विक आह्वान है। ऐसे दौर में जब जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण और घटते जलस्रोत मानव अस्तित्व के लिए चुनौती बन रहे हैं, आर्द्रभूमियों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। विश्व आर्द्रभूमि दिवस की नींव 2 फरवरी 1971 को पड़ी, जब ईरान के शहर रैमसर में आर्द्रभूमियों के संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसे रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) कहा जाता है। इसी ऐतिहासिक तारीख को याद रखने के लिए 1997 से हर साल 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य दुनिया को यह बताना था कि दलदल, झीलें, नदी किनारे, जलाशय और तटीय क्षेत्र सिर्फ पानी से भरी जमीन नहीं हैं, बल्कि ये धरती के सबसे संवेदनशील और उपयोगी पारिस्थितिक तंत्र हैं।

आखिर रामसर समझौता क्यों हुआ था?

1960 के दशक के अंत और 1970 के शुरुआती वर्षों में दुनिया के कई देशों में तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण हो रहा था। इस दौरान बड़ी संख्या में झीलें, दलदल और नदी किनारे की आर्द्रभूमियां सूखाई जा रही थी। कभी खेती के लिए, कभी सड़क और शहर बसाने के लिए। इसके कारण पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई, जलस्रोत प्रदूषित हुए और बाढ़ का खतरा बढ़ने लगा। खासतौर पर प्रवासी पक्षियों के संरक्षण को लेकर वैज्ञानिक और पर्यावरणविद चिंतित थे, क्योंकि आर्द्रभूमियां उनके लिए अस्थायी घर की तरह होती हैं। इसी चिंता के चलते दुनिया के देशों ने मिलकर एक साझा अंतरराष्ट्रीय ढांचा बनाने का फैसला किया, ताकि महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों को कानूनी संरक्षण मिल सके। यही जरूरत रामसर समझौते के रूप में सामने आई जिसका मूल उद्देश्य था, आर्द्रभूमियों का संरक्षण, उनका बुद्धिमानीपूर्ण उपयोग और जैव-विविधता की रक्षा।

रामसर समझौता क्या है और कैसे काम करता है?

रामसर कन्वेंशन दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौता है, जो विशेष रूप से आर्द्रभूमियों के संरक्षण पर केंद्रित है। इसके तहत जिन जलक्षेत्रों को जैवविविधता, जल संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है, उन्हें “रामसर साइट” घोषित किया जाता है। रामसर टैग मिलने के बाद उस क्षेत्र की निगरानी, संरक्षण और सतत प्रबंधन की जिम्मेदारी संबंधित देश पर बढ़ जाती है ताकि विकास हो, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं।

आर्द्रभूमियों को बचाने के लिए सबसे पहले इन क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और भराव (land filling) पर रोक लगानी होगी, औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट को सीधे जलस्रोतों में जाने से रोकने के लिए मजबूत ट्रीटमेंट सिस्टम लागू करना होगा और रासायनिक खेती के बजाय पर्यावरण-अनुकूल खेती को बढ़ावा देना होगा। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों को संरक्षण में भागीदार बनाना, अवैध अतिक्रमण हटाना, प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाना, वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाना और हर रामसर साइट के लिए स्पष्ट प्रबंधन योजना तैयार करना जरूरी है तभी आर्द्रभूमियां लंबे समय तक जीवित रह सकेंगी।

इसी बीच छत्तीसगढ़ के लिए यह अवसर और भी खास बन गया है, क्योंकि बिलासपुर जिले का कोपरा जलाशय राज्य की पहली रामसर साइट घोषित हो चुका है। यह जलाशय केवल सिंचाई और पेयजल का स्रोत नहीं, बल्कि कई स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण ठिकाना भी है। यहां दुर्लभ पक्षी प्रजातियां देखी जाती हैं, जिससे यह क्षेत्र जैवविविधता के लिहाज से बेहद संवेदनशील बन जाता है। रामसर मान्यता मिलने के बाद यहां मछली पकड़ने पर नियंत्रण, प्रदूषण पर निगरानी और पर्यावरणीय प्रबंधन के कड़े नियम लागू किए गए हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि आर्द्रभूमियां प्राकृतिक जल फिल्टर की तरह काम करती हैं। ये बाढ़ के पानी को सोखती हैं, भूजल स्तर को बनाए रखती हैं और जैवविविधता को सुरक्षित आश्रय देती हैं। अगर ये नष्ट हुईं, तो जल संकट और गहराएगा, बाढ़ का खतरा बढ़ेगा और कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। आर्द्रभूमियों को बचाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का सवाल है। पानी बचेगा, तभी जीवन बचेगा।