UGC New Rules Controversy: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी (UGC) के नए नियमों को लेकर देश में मचा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। खास तौर पर सवर्ण समाज में इन नियमों को लेकर नाराज़गी खुलकर सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ विरोध देश के कई राज्यों तक पहुंच गया है, राजधानी दिल्ली में आज सवर्ण समाज ने सड़कों पर उतरने का एलान किया है। पूरे देश में जारी विरोध के बाद अब सरकार सफाई देने में लगी है। सरकार की तरफ से कहा गया है कि UGC के नियम सभी के लिए निष्पक्ष होंगे और किसी के साथ भी कोई अनुचित व्यवहार नहीं किया जाएगा।

UGC के नए नियम को लेकर जारी विरोध पर सरकार ने कहा कि UGC के नियम सभी के लिए निष्पक्ष होंगे और किसी के साथ भी कोई अनुचित व्यवहार नहीं किया जाएगा। अधिसूचित नियमों को लेकर यदि कोई भ्रांतियां हैं, तो उन्हें दूर करने के लिए शिक्षा मंत्रालय जल्द ही स्पष्टीकरण जारी करेगा।

जानिए क्या है पूरा मामला

दरअसल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी को प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026 लागू किया है। इस नियम का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), महिलाओं और दिव्यांग छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करना बताया गया है। इन नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में 9 सदस्यों वाली एक समानता समिति यानी इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान किया गया है। इस समिति में संस्थान प्रमुख, तीन प्रोफेसर, एक कर्मचारी, दो सामान्य नागरिक, दो विशेष रूप से आमंत्रित छात्र और एक को-ऑर्डिनेटर शामिल होंगे. नियमों के अनुसार इस समिति की कम से कम पांच सीटें अनिवार्य रूप से SC, ST, OBC, दिव्यांगजन और महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।

क्यों बनाई जाएगी कमेटी?

ये समिति SC/ST, OBC दिव्यांग, महिलाओं की शिकायतों का निपटारा करेगी। ये ज्यादातर शिकायत सामान्य वर्ग के खिलाफ हो सकती है। ऐसे में बड़ा पेच ये है कि इस समिति में सामान्य वर्ग का कोई भी सदस्य नहीं होगा, समिति में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात ही नहीं की गई। सामान्य वर्ग को डर है कि इस नए नियम से उनके खिलाफ अन्याय और फर्जी शिकायतें दर्ज की जा सकती हैं।

सवर्ण समाज की आपत्ति क्या है

नए नियमों का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि समानता समिति में सामान्य वर्ग यानी जनरल कैटेगरी के लिए कोई अनिवार्य प्रतिनिधित्व तय नहीं किया गया है। उनका तर्क है कि जब समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी, तो सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को बिना पर्याप्त प्रतिनिधित्व के एकतरफा कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि नियम इस धारणा पर आधारित लगते हैं कि एक वर्ग हमेशा शोषित है और दूसरा वर्ग हमेशा शोषक। इससे शिक्षा परिसरों में अविश्वास का माहौल बन सकता है. सवर्ण समाज के कई संगठनों ने आशंका जताई है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को परेशान किया जा सकता है।

UGC का पक्ष

वहीं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का कहना है कि ये नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और समावेशन की भावना को मजबूत करने के लिए लाए गए हैं। आयोग का तर्क है कि बीते कुछ वर्षों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। UGC की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019-20 में भेदभाव से जुड़ी 173 शिकायतें दर्ज की गई थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। पांच वर्षों में कुल 1160 शिकायतें सामने आई हैं, यानी करीब 118 प्रतिशत की वृद्धि. आयोग का कहना है कि ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव एक गंभीर समस्या है और इसे रोकने के लिए मजबूत तंत्र की जरूरत है।

यह भी पढ़ेंः- ‘एक मूर्ख की वजह से देश इतना नुकसान नहीं झेल सकता…,’ किरेन रिजिजू का राहुल गांधी पर करारा वार, बोले- अब हर बिल पास कराएगी सरकार

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m