गौरव जैन, गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर जिला गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही नदियों और झरनों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहां नदियों से हो रहे अवैध उत्खनन ने नदी और आसपास के वन क्षेत्र के अस्तित्व पर खतरे की घंटी बजा दी है। खासकर जिले की तिपान नदी, जो न केवल स्थानीय लोगों के लिए जल स्रोत है बल्कि वन्यजीवों के लिए भी जीवनदायिनी है, अवैध रेत उत्खनन की बढ़ती घटनाओं के चलते संकट में है।

बता दें कि तिपान नदी और उसके आसपास के वन क्षेत्र में अवैध रेत, मुरुम और हैंड-ब्रोकर पत्थर का उत्खनन तेज़ी से बढ़ा है। इस अवैध गतिविधि का सबसे बड़ा केंद्र मरवाही वन मंडल के पिपरिया क्षेत्र में है। जहां रेत उत्खनन का काम दिन और रात धड़ल्ले से जारी है। सैकड़ों ट्रैक्टर और मजदूर लगातार नदियों से रेत निकालने में लगे रहते हैं, जिन्हें रोकने वाला कोई जिम्मेदार नहीं है। रेत निकालकर ट्रैक्टरों से शहरों में महंगे दामों पर बेचा जा रहा है। अवैध रेत उत्खनन करने वाले ट्रैक्टर मालिक और मजदूर इतने हठीले हैं कि कभी-कभी नदी के रेत को लेकर विवाद की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

जिम्मेदारों का कहना है कि शिकायतों की जांच और कार्रवाई की जा रही है, लेकिन वास्तविकता में अवैध उत्खनन का सिलसिला थम नहीं रहा है। अवैध रेत उत्खनन के कारण तिपान नदी में कई फीट गड्डे बन चुके हैं। पहले जहां साल भर पानी रहता था, अब नदी का जल स्तर लगातार घट रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो गर्मियों में पानी का स्रोत और नीचे चला जाएगा, जिससे वन्य जीवों के लिए पीने का पानी भी संकट में पड़ सकता है।

इस मामले में जब हमने जिला खनिज अधिकारी आदित्य मानकर से बात की तो उन्होंने कहा, “हमारी टीम अवैध रेत परिवहन कर रहे वाहनों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है। आज भी मौके से कुछ अवैध परिवहन गाड़ियों पर कार्रवाई की गई है। यह कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी और नदी के संरक्षण के लिए हमारी टीम सतत निगरानी रखेगी।”

गौरतलब है कि तिपान नदी में जारी अवैध रेत उत्खनन को रोकना अब बेहद जरूरी हो गया है। अगर समय रहते इस पर सख्त नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में नदी का अस्तित्व गंभीर खतरे में पड़ जाएगा और वन्य जीवों के लिए पीने का पानी भी संकटग्रस्त हो जाएगा।
इस स्थिति को देखते हुए प्रशासन और वन विभाग को अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाकर तिपान नदी और उसके आसपास के वन क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। केवल ऐसे उपायों से प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बना रहेगा और भविष्य में यह नदी सुरक्षित रह सकेगी।
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