रायपुर। विविधताओं से भरे भारत देश की सबसे बड़ी शक्ति है धर्म, संस्कृति और परंपराओं की बहुलता। ऐसी दशा में जब किसी राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े कानूनों में बड़ा बदलाव होता है तो उसका गहरा प्रभाव समाज, संस्कृति और राजनीति के विभिन्न आयामों पर भी पड़ता है। छत्तीसगढ़ में पारित धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक संरचना और प्रशासनिक व्यवस्था को एक नया रूप दे रहा है।
पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में धर्मांतरण से जुड़ी घटनाएं विशेष रूप से चर्चा का विषय रही है। छत्तीसगढ़ सरकार का मानना है कि बहुत से मामलों में धर्मांतरण स्वेच्छा से नहीं बल्कि प्रलोभन, दबाव या धोखाधड़ी के माध्यम से कराया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में मौजूदा स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 1968 भी अपर्याप्त महसूस हो रहा है, इसे अधिक प्रभावी और सख्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।
राज्य के मुख्यमंत्री ने इस विधेयक को राज्य के सामाजिक संतुलन और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए “मील का पत्थर” बताया है। मुख्यमंत्री साय के अनुसार यह कानून समाज के कमजोर वर्गों को संरक्षण देने और सामाजिक सद्भाव कायम रखने के उद्देश्य से लाया गया है। कुछ विशेषताओं को देखते हुए इस बात के लिए आश्वस्त हुआ जा सकता है कि यह अधिनियम अपने होने को सार्थक करेगा।


इस अधिनियम मे सख्ती और पारदर्शिता का गजब संतुलन देखा गया है। धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 कई दृष्टि में अपने पूर्ववर्ती कानून से अधिक व्यापक और कठोर है। इसमे अवैध धर्मांतरण के मामलों में 3 से 10 साल तक की सजा और 1 से 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का भी प्रावधान है। यदि मामला सामूहिक धर्मांतरण का हो तब यही सजा आजीवन कारावास तक भी बढ़ सकती है और जुर्माना न्यूनतम 25 लाख रुपये तक हो सकता है।
कमजोर वर्गों को विशेष सुरक्षा देने की व्यवस्था इस अधिनियम में है। नाबालिगों, महिलाओं और SC/ST वर्ग के लोगों के धर्मांतरण पर विशेष सख्ती रखी गई है। ऐसे केस में 10 से 20 साल तक की सजा और कम से कम 10 लाख रुपये का जुर्माना निर्धारित किया गया है। धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 मे पारदर्शिता को काफ़ी महत्व दिया गया है। इसमे धर्म परिवर्तन करने वालों को धर्म परिवर्तन से पहले 60 दिन की नोटिस देनी होगी और उसके बाद 21 दिनों के भीतर रिपोर्टिंग करना अनिवार्य होगा।
अधिनियम की इस प्रक्रिया से बहुत हद तक यह सुनिश्चित हो जाता है कि धर्मांतरण पूरी तरह स्वैच्छिक हो और उसमें किसी भी प्रकार का दबाव या प्रलोभन न हो। इस कानून का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अब धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति पर ही इस बात को साबित करने की जिम्मेदारी भी होगी कि धर्मांतरण स्वेच्छा से हुआ है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, जैसे सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए होने वाले धर्मांतरण को भी इस कानून के दायरे में रखा गया है। केवल विवाह के उद्देश्य से किए गए धर्म परिवर्तन को भी तब तक अवैध माना जाएगा जब तक कि निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन न किया गया हो।

सीएम की दृष्टि में सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक संतुलन
राज्य के मुख्यमंत्री ने इस विधेयक को केवल एक कानूनी सुधार के अलावा सामाजिक संतुलन का माध्यम बताया है। उनका मानना है कि समाज के कमजोर वर्गों को लक्षित कर किए जा रहे धर्मांतरण से सामाजिक पारंपरिक व्यवस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 उन प्रवृत्तियों पर भी अंकुश लगाने का काम करेगा जो भ्रम, प्रलोभन और दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन कराते हैं। अधिनियम की पारदर्शी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करेगी कि धर्मांतरण स्वेच्छा से ही किया जा रहा है। मुख्यमंत्री साय ने यह भी कहा कि “पूर्व में लागू कानून अपेक्षाकृत कमजोर था, जिसके कारण अवैध गतिविधियों को रोकने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई।“
ऐतिहासिक संदर्भों से ली प्रेरणा
मुख्यमंत्री ने स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव के धर्मांतरण के विरुद्ध चलाए गए जनजागरण अभियान को प्रेरणास्रोत बताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। स्व. दिलीप सिंह जूदेव के अनुसार “धर्मांतरण केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान से जुड़ा हुआ विषय है। कबीरधाम जिले के विकासखंड पंडरिया के गांव ग्राम पिपरहा की पुनीता बाई धुर्वे
पति का नाम भानु राम धुर्वे और विकासखंड पंडरिया जिला कबीरधाम, ग्राम पंचायत सिंगपुर के भानु सिंह धुर्वे पिता चैतूसिंह धुर्वे ने घर वापसी करके समाज को एक गुप्त मगर सशक्त संदेश दिया है।

धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
यह कानून स्थानीय परंपराओं और आदिवासी संस्कृति की रक्षा करते हुए सांस्कृतिक संरक्षण मे भी सहायक हो सकता है ।दबाव पूर्वक किए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाए जाने से सामाजिक तनाव में कमी लाकर सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा मे बढ़ा जा सकता है। स्पष्ट प्रक्रिया और समय सीमा से न्यायिक पारदर्शिता का एक शानदार उदाहरण बन रहा है यह अधिनियम, इससे न्यायिक व्यवस्था मजबूत होगी। संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार तो देता है फिर भी इस अधिनियम की सख्त जरूरत है क्योंकि यह कानून एक संतुलन बनाने का प्रयास है। एक ऐसा संतुलन जिसमे व्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और समाज को अवैध और अनैतिक गतिविधियों से भी बचाया जा सके। इस कानून की सफलता इस बात पर आधारित होगी कि इसका क्रियान्वयन कितनी निष्पक्षता और पारदर्शिता से किया जाता है।
प्रशासनिक व्यवस्था और क्रियान्वयन
इस अधिनियम मे मामलों की जांच उप-निरीक्षक स्तर के पुलिस अधिकारी द्वारा की जाएगी। विशेष न्यायालयों में ही इसकी सुनवाई होगी और 6 महीने के भीतर निर्णय दे दिया जाएगा। धर्म परिवर्तन की सूचना को सार्वजनिक किया जाएगया ताकि जन निगरानी संभव हो सके।

एक संतुलित भविष्य की ओर छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम। यह अधिनियम सामाजिक संतुलन और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान भी है। छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में लिया गया यह कदम राज्य को एक सशक्त, संतुलित और सांस्कृतिक रूप से समृद्धि की दिशा में ले जाने का एक सु-प्रयास है। यह कानून न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है बशर्ते इसका क्रियान्वयन निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ किया जाए।
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