रविंद्र कुमार भारद्वाज, रायबरेली. उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में हर नए सत्र में ‘री-एडमिशन’ या ‘रिन्यूअल फीस’ के नाम पर ली जाने वाली अतिरिक्त फीस अब अभिभावकों के लिए बड़ा सिरदर्द बन गई है. बच्चा उसी स्कूल में सालों से पढ़ रहा हो, सुविधाएं और शिक्षक वही हों, फिर भी हर साल दोबारा एडमिशन फीस क्यों? यह सवाल अब हजारों माता-पिता के मन में उठ रहा है.
इसे भी पढ़ें- कब सुधरेगा ‘निकम्मा’ सिस्टम? शिकायत के बाद भी खाकी वालों ने नहीं की कार्रवाई, अब बदमाशों ने दुकान जलाकर किया खाक, शायद यही है सुशासन!
अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन एडमिशन फीस के अलावा डेवलपमेंट चार्ज, वार्षिक शुल्क, सिक्योरिटी डिपॉजिट (जो अक्सर वापस नहीं मिलती), स्मार्ट क्लास चार्ज और एक्टिविटी फीस आदि कई मदों में पैसे वसूल लेते हैं. मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों के लिए यह खर्च शिक्षा की मूल भावना के खिलाफ है. कई माता-पिता बताते हैं कि फीस बढ़ोतरी की कोई ठोस वजह नहीं बताई जाती, सिर्फ ‘स्कूल की नीति’ का हवाला दिया जाता है. इससे बच्चे की पढ़ाई प्रभावित होती है और कई परिवार मजबूरन स्कूल बदलने या किश्तों में फीस भरने को विवश हो जाते हैं.
इसे भी पढ़ें- भाई-बहन और जिस्म का सौदाः स्पा सेंटर की आड़ में चल रहे सेक्स रैकेट का भंडाफोड़, कमरे के अंदर 3 युवतियां और…
स्कूल प्रबंधन का दावा है कि इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड, मेंटेनेंस, स्टाफ सैलरी, बिजली-पानी, सुरक्षा और डिजिटल सुविधाओं के लिए ये चार्ज जरूरी हैं. महंगाई के दौर में खर्च बढ़ रहे हैं, इसलिए फीस में संशोधन अनिवार्य हो जाता है, लेकिन अभिभावक तर्क देते हैं कि फीस संरचना पारदर्शी नहीं है. फीस बढ़ोतरी की सूचना आखिरी समय में दी जाती है, पैरेंट-टीचर एसोसिएशन (PTA) से राय नहीं ली जाती और कोई ऑडिट रिपोर्ट साझा नहीं की जाती. यह मुद्दा अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि शिक्षा में न्याय और जवाबदेही का बन गया है.
इसे भी पढ़ें- मौत की परीक्षाः हाईस्कूल का एग्जाम देकर लौट रहे थे 3 छात्र, तभी हुआ कुछ ऐसा कि 2 की चली गई जान…
समाजवादी पार्टी के रायबरेली जिलाध्यक्ष वीरेंद्र यादव ने इस पर गंभीर चिंता जताई है।.उन्होंने कहा, “निजी स्कूलों की यह मनमानी आम जनता, खासकर गरीब और मध्यम वर्ग पर अन्याय है.” निजी स्कूलों की फीस संरचना की सख्त जांच हो, फीस बढ़ोतरी के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य की जाए, सभी चार्ज की विस्तृत सूची स्कूल की वेबसाइट पर अपलोड करना जरूरी हो और शिकायतों पर तेज कार्रवाई हो. उन्होंने इसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम से जोड़ते हुए कहा कि बिना पारदर्शिता के शिक्षा सुलभ नहीं रह सकती. यदि सरकार समय रहते सख्त नियम नहीं बनाती और निजी स्कूलों पर अंकुश नहीं लगाती, तो यह बोझ और बढ़ता रहेगा. इससे कई बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हो सकते हैं.
- छत्तीसगढ़ की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- उत्तर प्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- लल्लूराम डॉट कॉम की खबरें


