कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी के प्रकोप को देखते हुए ग्वालियर जिला प्रशासन ने पशु हित में एक बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है। ग्वालियर कलेक्टर ने जिले में दोपहर के समय पशुओं से श्रम कराने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।

दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक रहेगा ‘नो वर्क ज़ोन’

IAS रूचिका चौहान द्वारा जारी आदेश में यह बात साफ कर दी गई है कि दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक किसी भी प्रकार का वजन ढोने या सवारी कराने पर रोक रहेगी। गर्मी के कारण पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी जान को होने वाली संभावित खतरे को देखते हुए लिया गया है। यह फैसला प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट 1960 के तहत लिया गया है।

1 मई से 30 जून तक लागू रहेगा नियम

जिला प्रशासन का यह प्रतिबंध उन पर लागू होगा जो पशुओं के द्वारा माल ढुलाई करवाते हैं। यह आदेश 1 मई 2026 से प्रभावी हो चुका है और 30 जून 2026 तक पूरे जिले में सख्ती से लागू रहेगा। जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इन दो महीनों के दौरान दोपहर की भीषण तपिश में पशुओं से काम लेना कानूनन अपराध माना जाएगा।

प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट 1960 ?

मुख्य विशेषताएं

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 भारत का एक प्रमुख कानून है जिसका मुख्य उद्देश्य जानवरों को दी जाने वाली अनावश्यक पीड़ा या सजा को रोकना है। यह कानून जानवरों के प्रति मानवीय व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। इसके द्वारा जानवरों के प्रति क्रूरता और उनके उत्पीड़न की प्रवृत्ति पर लगाम लगाना है।

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 4 के तहत वर्ष 1962 में भारतीय पशु कल्याण बोर्ड की स्थापना की गई थी। यह बोर्ड सरकार को पशु कल्याण से संबंधित मामलों पर सलाह देता है और कानून के कार्यान्वय की नगरानी करता है।

अधिनियम में दंड का प्रावधान

जानवरों को पीटने, लात मारने, जरूरत से ज्यादा बोझ लादने, भूखा रखने या उन्हें असुरक्षित स्थिति में रखने जैसे कृत्यों को क्रूरता के दायरे में रखा गया है। ऐसा करते पाए जाने पर जुर्माने और कारावास का प्रावधान है।

2017 के नियम

वर्ष 2017 में सरकार ने जानवरों के रखरखाव और जब्ती से संबंधित नए नियम अधिसूचित किए थे। पशुओं की प्रति क्रूरता की रोकथाम (संपत्ति व जानवरों की देखभाल और रखरखाव) नियम, 2017 को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के तहत स्थापित किया गया है। अधिनियम के तहत ये निमय न्यायाधीश को मुकदमे का सामना कर रहे किसी व्यक्ति के मवेशियों को जब्त करने की अनुमति देते हैं। इसके बाद जानवरों को पशु चिकित्सालय, पशु आश्रयों इत्यादि में भेज दिया जाता है। ऐसे जानवरों को अधिकारियों द्वारा गोद भी दिया जा सकता है।

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