Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

सिर्फ 12%

राज्य में कुल 174 आईएएस, 135 आईपीएस और 111 आईएफएस अफसर हैं। कुल मिलाकर 420 अधिकारी। अब 420 पर ज्यादा मत अटकिए। यह सिर्फ संख्या है। कुल जोड़ है। खैर, मुद्दे की बात यह है कि बीते दो सालों में इन 420 में से 50 अफसरों के खिलाफ ईओडब्ल्यू-एसीबी में भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए हैं। कुल संख्या का 11.9%। सुविधा के लिए कहिए 12%। सरकारी सिस्टम में 88% लोग शानदार तरीके से चुपचाप काम कर रहे हैं। इनकी कम से कम तब तक तो तारीफ की ही जा सकती है, जब तक इन 88% लोगों में से कुछ और के नाम भ्रष्ट आचरण के लिए सामने नहीं आ जाते। सिस्टम में संतुलन जरूरी है। अगर सब ईमानदार हो जाएंगे तो जांच एजेंसियां करेंगी क्या? अगर सब दोषी हो जाएंगे तब ईमानदारी का उदाहरण बनेगा कौन? इन सबके बीच यह भी गौरतलब है कि 12% अफसरों के खिलाफ केवल प्रकरण दर्ज है। फैसला आया नहीं है। अगर कभी फैसला आया भी, तो अपील होगी। अपील के बाद पुनर्विचार होगा। समय गुजरता चला जाएगा फिर एक दिन स्मृति लोप हो जाएगा। लोग यह भूल जाएंगे कि कभी फलाने अफसर के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई प्रकरण दर्ज भी हुआ था। इस तरह न्याय और जीवन दोनों आगे बढ़ते रहेंगे। फिलहाल खुश होइए कि राज्य ऐसे 88% अफसरों के हाथों चल रहा है, जिन पर कम से कम किसी किस्म का आरोप नहीं लगा है। हालांकि जमीन पर स्थिति ठीक उलट है। हकीकत यह है कि कोई भी सरकारी सिस्टम महज 12% अफसरों के बूते चलता है। बाकी के 88% बस चेहरे होते हैं।

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चाबी

ईओडब्ल्यू-एसीबी लाख कदमताल क्यों न कर ले। जब तक सरकार की अनुमति नहीं मिल जाती, तब तक वह आला अफसरों के खिलाफ जांच नहीं कर सकती। कहानी कुछ यूं है कि धारा 17(क) नाम की एक वीआईपी चाबी है। इस चाबी से ही जांच का दरवाजा खुलता है। यह चाबी सरकार के पास है। अब चाबी किसके लिए घूमेगी और किसके लिए जाम हो जाएगी, यह सरकार तय करती है। पिछले दो सालों में इस चाबी से 16 आईएएस और 6 आईपीएस अफसरों के खिलाफ जांच का दरवाजा खोल दिया गया। राज्य गठन के बाद संभवतः यह पहली बार हुआ होगा, जब सूबे की मौजूदा सरकार ने सुपीरियर सर्विस के करीब दो दर्जन अफसरों के खिलाफ जांच की अनुमति दी है। मगर दिलचस्प पहलू यह भी देखने को मिला है कि जैसे ही बात आईएफएस बिरादरी के खिलाफ जांच की आई, जंगल में सब कुछ सामान्य दिखने लग गया। 8 आईएफएस अफसरों के खिलाफ जांच की अनुमति नहीं दी गई। 5 अफसरों के खिलाफ जांच की अनुमति संबंधी फाइल टेबल के किनारे रख दिया गया। केवल दो अफसरों के खिलाफ ही जांच की अनुमति दी गई। अरुण प्रसाद, ए के बोआज, विवेक आचार्य, ओ पी यादव, जगदीशन, कुमार निशांत, जे एस कैलाशिया और दिलेश्वर साहू जैसे अफसरों के खिलाफ जांच की मांग सरकार ने खारिज कर दी। अनूप भल्ला, के के खेलवार, लक्ष्मण सिंह, चूड़ामणि सिंह और एस पी मसीह के प्रकरण लंबित रखे गए हैं। अशोक पटेल और रमेश चंद्र दुग्गा के खिलाफ जांच की अनुमति दी गई है। आईएएस और आईपीएस सुपीरियर सर्विस है। जाहिर है, इन सर्विसेज से जुड़े अफसरों का थोड़ा बहुत भी किया धरा बादलों की तरह खूब गरजता है, मगर आईएफएस बिरादरी मेनस्ट्रीम से थोड़ी अलग है। यहां अफसरों की बड़ी करतूतों पर भी ध्यान जरा कम ही जाता है। ब्यूरोक्रेसी में यह कहावत भी है कि जंगल विभाग की 90 फीसदी फाइलों में कहीं न कहीं सुराख मिल ही जाता है। यह बिरादरी किस्मत की धनी है। जंगल विभाग में पेड़ इतने घने हैं कि बड़ी-बड़ी करतूत भी पत्तों की सरसराहट के बीच खो जाती है।

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धरोहर

सरकार ने विधानसभा में यह बताया है कि ईओडब्ल्यू-एसीबी में कुल 143 प्रकरण लंबित हैं। 343 अफसरों पर आरोप है। 30 साल से 1 प्रकरण, 20 साल से 12, 10 साल से 27, 5 साल से 28 और 5 साल से कम के 74 प्रकरण लंबित हैं। इनकी विवेचना चल रही है। ईओडब्ल्यू-एसीबी में लंबित प्रकरणों के आंकड़े बेहद अनुभवी हो गए हैं। ज्यादातर फाइलें इतनी पुरानी हो गई है कि उस पर समय की एक मोटी परत जम गई है। जाहिर है कि 30 साल पुराने प्रकरण में आरोपित अफसर रिटायर हो चुका होगा। 20 साल पुराने प्रकरण में जिन अफसरों पर आरोप है, उन्होंने दो-तीन सरकारें देख ली होंगी। 10 साल पुराने प्रकरण की फाइल में जिन अफसरों का नाम दर्ज होगा, उनका रसूख इतना बड़ा होगा कि जांच की आंच उन तक नहीं पहुंच पाती होगी और इसके बाद का हाल सब जानते हैं। फिलहाल बीते दो सालों का जिक्र करें, तो कोयला, शराब, डीएमएफ किस्म के घोटालों का ओर छोर इतना बड़ा है कि उसे पकड़ने में एजेंसी ने पूरी ताकत झोंक रखी है। फिर भला पुराने प्रकरणों पर ध्यान दे भी दिया जाए तो हासिल क्या होगा? ईओडब्ल्यू-एसीबी का सेटअप उधार के अफसरों के बूते चल रहा है। अब अफसरों के हाथ देवताओं की तरह तो है नहीं कि वह चार-चार हाथ से काम कर लें। खैर, सरकार को अब इसका व्यावहारिक समाधान ढूंढना चाहिए। ईमानदारी की लाख दुहाई क्यों न दे दी जाए। जमीनी हकीकत से आम आदमी भी बखूबी वाकिफ है। अब यह सवाल उठना लाजमी है कि जब अवैध वसूली सरकारी सिस्टम का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हो, तब क्यों न एक अधिकारिक कमीशन नीति बनाकर इसे वैध कर दिया जाए? वेतन आयोग की तरह एक कमीशन आयोग बन जाए। ग्रेड पे की तरह ग्रेड कमीशन तय हो। हर विभाग का अलग-अलग स्लैब हो। जो अफसर तय सीमा से ज्यादा वसूले, उसके लिए एक न्यायाधिकरण बन जाए। जहां फास्ट ट्रैक सुनवाई हो। तीन महीने में फैसला सुना दिया जाए और ईओडब्ल्यू-एसीबी को एक विरासत स्थल घोषित कर दिया जाए। टिकट लेकर लोग यहां आए और देखें कि 30 साल, 20 साल, 10 साल तक की पुरानी- पुरानी विवेचना आखिर कैसे एक राजकीय धरोहर बन गई है।

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तरक्की की सीढ़ी

पिछले हफ्ते राज्य सेवा के अफसरों की आईएएस प्रमोशन की सूची जारी हुई। इनमें से एक नाम है- तरुण किरण। 2014 बैच के जीएसटी अफसर। काबिलियत पर कोई सवाल नहीं। वह फाइलों की भाषा समझते हैं। नियमों की बारीकियां जानते हैं। प्रशासनिक तर्कों में दक्ष भी हैं। मगर चर्चा उनकी योग्यता पर नहीं, बल्कि उनकी गति पर है। प्रशासनिक सीढ़ी चढ़ने में उन्होंने ऐसा स्प्रिंट लगाया कि कई लोग अभी वार्म-अप ही कर रहे थे। दरअसल मामला वरिष्ठता का है। राज्य प्रशासनिक सेवा के 2013 बैच के कई अफसर अब भी आईएएस की कतार में खड़े हैं। ऐसे में 2014 बैच के एलाइड सर्विस अफसर का आईएएस बन जाना कतारबद्ध व्यवस्था की आत्मा को थोड़ा असहज कर गया है। जब राज्य प्रशासनिक सेवा के 2013 बैच के बचे हुए अफसर आईएएस बनेंगे, तब उनकी सीनियरिटी प्रभावित होगी। तरुण किरण को आईएएस बनाने के समीकरण साल भर पहले से ही बुनने शुरू हो गए थे। आईएएस प्रमोशन के लिए डिप्टी कलेक्टर के समकक्ष पद पर आठ साल की सेवा और 5400 रुपये ग्रेड पे की शर्त है। संयोग से तरुण किरण का ग्रेड पे 6600 रुपये हो चुका था। यानी वे नियम की चौखट से थोड़ा ऊंचे खड़े थे। तकनीकी संतुलन बनाने के लिए साल भर पहले ही उनके ग्रेड पे को 5400 पर ला दिया गया था। बहरहाल अब सुनाई पड़ रहा है कि राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर इस मामले में कानूनी सलाह-मशविरा ले रहे हैं। सरकार का निर्णय अंतिम होता है, यह सब जानते हैं। मगर यह प्रकरण प्रशासनिक हलकों में एक नया पाठ जरूर जोड़ गया है। कुल जमा लब्बोलुआब ये है कि प्रशासनिक व्यवस्था में तरक्की की सीढ़ियां व्याख्याओं से बनती हैं। तरुण किरण को आईएएस बनाने एक पावरफुल लाबी सक्रिय थी, सो एक नई व्याख्या गढ़ दी गई।

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फायदा या नुकसान?

नायब तहसीलदार से सरकारी नौकरी की शुरुआत करने वाले वीरेंद्र बहादुर पंचभाई ने आईएएस बनकर मिसाल तो रच दी है, मगर विडंबना यह है कि वह महज दो साल ही आईएएस रह पाएंगे। आईएएस बनकर उन्हें एक तरह से नुकसान हो गया है। राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर बने रहते तो 62 साल की उम्र में रिटायर होते। आईएएस बनने के बाद उन्हें 60 साल की उम्र में रिटायर होना पड़ेगा। उनके हिस्से केवल आईएएस कहलाने का सुख आएगा। साल 2028 में उनका रिटायरमेंट है। दो साल के लिए सरकार उन्हें कलेक्टर बना नहीं सकती। सीनियरिटी की लंबी चौड़ी सूची सरकार के सामने है। सरकार उन नामों को सुपरसीड करेगी नहीं।

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निजी हित

एक प्राधिकरण में एडिशनल सीईओ का चार्ज लेते ही एक तेज दिमाग अफसर ने अपना निजी हित ढूंढना शुरू किया। कुछ दिन तक तो उन्हें कुछ समझ नहीं आया। एक दिन अचानक दफ्तर आते ही उन्होंने डेली वेजेस कर्मचारियों की तनख्वाह रोक दी। छुट्टी का अड़ंगा लगा दिया। एडिशनल सीईओ ने फरमान जारी किया कि डेली वेजेस कर्मचारियों की छुट्टी के दिन की तनख्वाह कटेगी। छुट्टी के नियम नियमित कर्मचारियों के लिए लागू होते हैं। नाराज कर्मचारियों ने हंगामा मचा दिया। प्राधिकरण के अध्यक्ष से लेकर सीईओ तक से शिकायत कर दी। पूछताछ हुई, तब एडिशनल सीईओ ने नियमों की किताब खोलकर उनके सामने रख दी। नियम वहीं थे, जिसे उन्होंने आधार बनाया था। कर्मचारी पशोपेश में थे। तब एडिशनल सीईओ ने अपना निजी हित साधते हुए समाधान कर्मचारियों के सामने रख दिया। राजधानी से 75 किलोमीटर दूर बने फार्म हाउस की देखरेख और कामकाज के लिए चार-पांच डेली वेजेस कर्मचारियों की तैनाती करवा दी। अब प्राधिकरण की तनख्वाह पर काम करने वाले कर्मचारी एडिशनल सीईओ का फार्म हाउस संभाल रहे हैं।

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बड़ा खेल

पिछली सरकार के वक्त एक कारोबारी ने राजधानी के एक प्राइम लोकेशन पर सरकार से बड़ी जमीन ली थी, लेकिन तब उसने जमीन की रजिस्ट्री नहीं कराई। तब जमीन गाइडलाइन की दर कम थी। अब गाइडलाइन दर बढ़ गई है। सुनते हैं कि जमीन की कीमत तब करीब 90 करोड़ रुपए के आसपास थी। मगर आज उसकी कीमत में दस गुना तक की बढ़ोतरी हो गई है। कारोबारी पुरानी वैल्यू पर रजिस्ट्री कराना चाहता है। मामला फंस गया है, सो उसने ऊपर से नीचे तक अपने संपर्कों को साधना शुरू कर दिया है। फिलहाल तो इस मामले में अभी कई पेंच हैं, फिर भी अगर समाधान निकला तो मानकर चलिए कि कईयों की जेब भारी दिखाई देगी। वैसे भी जहां जमीन की कीमत आसमान छूती है, वहां समझौते की कोई सीमा नहीं रह जाती।

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