हेमंत शर्मा, इंदौर। एमपी का इंदौर… एक ऐसा शहर जहां रंग पंचमी सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और उत्साह का वो संगम है जिसे देखने के लिए लोग देश ही नहीं विदेशों से भी यहां पहुंचते हैं। होली के पांच दिन बाद निकलने वाली इंदौर की ऐतिहासिक गेर आज दुनिया की सबसे अनोखी रंग यात्रा मानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई? कितनी गेर निकलती हैं और कैसे 500 लोगों से शुरू हुआ यह कारवां आज लाखों तक पहुंच गया।
परंपरा की शुरुआत
इंदौर के अंदर सालों पुरानी एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई थी, जिसमें रंग पंचमी के दिन लोग हाथी, घोड़े, बैल और ऊंट पर सवार होकर शहर में रंग खेलते हुए निकलते थे। उस समय यह आयोजन छोटा जरूर था, लेकिन उत्साह उतना ही बड़ा था। राजवाड़ा क्षेत्र में होलकर काल से रंग पंचमी मनाने की परंपरा चली आ रही थी। धीरे-धीरे यह उत्सव राजघराने से निकलकर आम लोगों तक पहुंच गया और फिर पूरे शहर का त्योहार बन गया।
1948 में शुरू हुई आधुनिक गेर
आज जिस गेर को पूरा देश पहचानता है, उसकी शुरुआत साल 1948 में हुई। टोरी कॉर्नर क्षेत्र के रहने वाले बाबूलाल गिरी ने पहली बार संगठित तरीके से गेर निकालने की शुरुआत की। उस समय इस गेर में सिर्फ 500 से 700 लोग शामिल होते थे। ना बड़े टैंकर थे और न गुलाल उड़ाने वाली मशीनें। बस लोग थे, रंग था और उत्साह था। आज उसी परंपरा को गिरी परिवार की तीसरी पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। एक समय ऐसा भी था जब गेर में हाथी, घोड़े और बैलों का इस्तेमाल होता था। लेकिन बाद में पशुओं के उपयोग पर रोक लगा दी गई। पहले हाथ से चलने वाले पंप से गुलाल उड़ाया जाता था, फिर लोहे के पंप आए, और अब बोरिंग मशीन और बड़े ब्लोअर से आसमान तक रंग उड़ाया जाता है। आज गेर पूरी तरह हाईटेक हो चुकी है।
लाखों की भीड़, दुनिया की नजर
आज इंदौर की गेर में करीब 5 लाख से ज्यादा लोग शामिल होते हैं। राजवाड़ा पर ऐसा लगता है जैसे पूरा शहर रंग में डूब गया हो। रंग भरी तोपें, पानी की बौछार, गुलाल के बादल और फूलों की बारिश, इन दृश्यों को देखने के लिए लोग सुबह से ही राजवाड़ा पर जमा हो जाते हैं। इंदौर प्रशासन अब इस ऐतिहासिक गेर को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने और यूनेस्को रिकॉर्ड में शामिल कराने की कोशिश भी कर रहा है।
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