माह-ए-रमजान 2026: इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र और बरकत वाला महीना माह-ए-रमजान अपने आखिरी अशरा में पहुंच चुका है। आज 14 मार्च को रमजान का 24वां रोजा रखा गया है। रमजान महीने के अंतिम दस दिनों को ‘जहन्नुम की आग से निजात’ का अशरा कहा जाता है। इस दौरान इबादत, कुरान की तिलावत, तरावीह और एतिकाफ (मस्जिद में एकांतवास) के साथ ‘शब-ए-कद्र’ का विशेष महत्व होता है। इस दौरान आत्म-नियंत्रण, नमाज और गरीबों की मदद के लिए जकात और फितरा देने का सवाब कई गुना बढ़ जाता है।
क्या होते हैं जकात के मायने ?
- जकात का तात्पर्य दान करने से होता है।
- रमजान के पाक महीने में मुस्लिमों के लिए जकात अदा करना जरूरी बताया गया है।
- माना जाता है कि रमजान के महीने में की गई इबादत जकात देने के बाद ही कुबूल होती है।
- जकात में हर मुसलमान को अपनी पूरे साल की बचत का 2.5 फीसदी हिस्सा जरूरतमंद को दान करने के लिए कहा गया है।
- मान्यता है कि व्यक्ति रमजान के दिनों में जितना ज्यादा जकात करता है, उसके घर में उतनी ज्यादा बरकत आती है।
- इससे जरूरतमंद की मदद होती है और जकात करने वाले का रिश्ता अल्लाह से और मजबूत हो जाता है।
- जकात में खर्च किया जाने वाला धन मेहनत की कमाई का होना चाहिए।
- जकात विधवा महिलाओं, अनाथ बच्चों, बीमार व कमजोर व्यक्ति आदि किसी भी जरूरतमंद को दी जा सकती है।
- जकात का नियम है कि परिवार में जितने भी सदस्य कमाते हैं, उन सभी को जकात देना जरूरी बताया गया है।
क्या होता है फितरा
फितरा यानी चैरिटी करना होता है। संपन्न लोग जिनके पास धन की कमी नहीं है, उन्हें रमजान के महीने में ईद से पहले जरूरतमंदों को फितरा की रकम अदा करने की बात कही गई है। हालांकि जकात को हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया गया है, लेकिन फितरा को जरूरी नहीं माना गया है। फितरा की रकम गरीबों, विधवाओं व यतीमों को दी जाती है, ताकि ईद के दिन किसी के हाथ खाली न रहें। फितरा की कोई रकम तय नहीं होती, इसे व्यक्ति अपनी स्वेच्छा के अनुसार दे सकता है।
Lalluram.Com के व्हाट्सएप चैनल को Follow करना न भूलें.
https://whatsapp.com/channel/0029Va9ikmL6RGJ8hkYEFC2H

