अभय मिश्रा, मऊगंज। मध्य प्रदेश के नवनिर्मित जिले मऊगंज में भ्रष्टाचार का कुआं इतना गहरा हो चुका है कि इसमें जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए समा गए, लेकिन खेतों को एक बूंद पानी नसीब नहीं हुआ। ‘लल्लूराम डॉट कॉम’ की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन में एक ऐसा चौंकाने वाला महाघोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक साठगांठ, फर्जी वेंडरों के सिंडिकेट और नेताओं की कथित चुप्पी को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
जनपद पंचायत मऊगंज और हनुमना में वॉटरशेड समिति और मनरेगा के नाम पर 35 करोड़ 81 लाख रुपए का ऐसा ‘खेल’ खेला गया है, जिसने कागजों पर तो जलक्रांति ला दी, लेकिन हकीकत यह है कि 85% तालाब अधूरे पड़े हैं और 95% में एक बूंद पानी तक नहीं है।
पानी की तरह बहाया जनता का पैसा
दस्तावेजों और धरातल की पड़ताल के अनुसार, भ्रष्टाचार का यह ताना-बाना दो स्तरों पर बुना गया-
1. वॉटरशेड समिति का खेल: जनपद पंचायत मऊगंज और हनुमना में वॉटरशेड समिति द्वारा खेत तालाब, लघु सिंचाई तालाब, अर्दन टैंक, चेक डैम और अमृत सरोवर मिलाकर कुल 21 करोड़ 84 लाख 60 हजार रुपए फूंक दिए गए।
2. मनरेगा की सेंधमारी: मनरेगा योजना के तहत हितग्राही मूलक योजना में लगभग 2 करोड़ रुपए की लागत से 88 खेत तालाबों का निर्माण दिखाया गया। वहीं, सामुदायिक योजना के अंतर्गत मऊगंज में 13, हनुमना फेज-1 में 46 और फेज-2 में 8 अमृत सरोवर कागजों पर चमका दिए गए।
चौंकाने वाली बात यह है कि इन अनुपयोगी तालाबों को बनाने के बाद इनके ‘मेंटेनेंस’ (रखरखाव) के नाम पर भी कई लाख रुपए की अतिरिक्त निकासी कर ली गई।
नदी के बगल में तालाब! 50,000 की खुदाई और लाखों का वारा-न्यारा
हमारी टीम ने जब गांव-गांव जाकर इन तालाबों की हकीकत देखी, तो तकनीकी मापदंडों की धज्जियां उड़ी मिलीं। कई जगहों पर ठीक नदी के बगल में तालाब खोद दिया गया है, जिसका कोई भौगोलिक औचित्य ही नहीं था। अधिकांश तालाबों में केवल खेत की मिट्टी निकालकर चारों तरफ मेढ़ (बाउंड्री) बना दी गई और उसे उसी हाल में छोड़ दिया गया। यदि धरातल पर हुए काम की वास्तविक कीमत आंकी जाए, तो यह लगभग 50,000 से भी कम बैठती है। यानी चंद हजार का काम कराकर, बाकी के लाखों रुपए डकार लिए गए। नतीजा यह हुआ कि इन तालाबों में पानी टिकता ही नहीं।
कागजी वेंडरों का ‘सिंडिकेट’ और बंद कमरों से जीएसटी चोरी
वॉटरशेड समिति ने कुल 252 कार्य कराए, जिनमें काम करने के बजाय सिर्फ ‘बिलिंग’ का खेल हुआ। बिना अनुभव और बिना संसाधनों वाले चुनिंदा वेंडरों पर करोड़ों रुपए की मेहरबानी बरसाई गई।
राम कैलाश मौर्य ट्रेडर्स, सद्गुरु ट्रेडर्स, अमित ट्रेडर्स: इन तीन एजेंसियों ने मिलकर 23 कार्य किए और लगभग 3 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान झटक लिया।
सत्य सेल्स एवं सूर्या सेल्स: इनके खाते में 67 कार्य दिखाए गए और अनुमानित 5 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया।
एस एल ट्रेडर्स: कुल 52 कार्यों के एवज में लगभग 4 करोड़ रुपए से अधिक की राशि डकारी।
अन्य संदेहास्पद फर्में: संतोष कंस्ट्रक्शन (14 तालाब) और इन्ही का दूसरा फार्म गौसिया ट्रेडर्स (4 कार्य), लक्ष्मी ट्रेडर्स (4 कार्य), सुरेश कुमार गुप्ता (3 कार्य), नरेंद्र तिवारी (2 कार्य), सद्गुरु (2 कार्य), गुलाबकली एंटरप्राइजेस (1 कार्य) और एक अन्य ट्रेडर्स शामिल हैं।
इनमें से अधिकांश वेंडर धरातल पर वजूद में ही नहीं हैं। इन्हें सिर्फ और सिर्फ बंद कमरों में जीएसटी चोरी करने और सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने के लिए वेंडर बनाया गया था। इनके बैंक खातों की गहन जांच हो, तो कई सफेदपोश बेनकाब होंगे।
एक ही ग्राम पंचायत में 2.81 करोड़ का घोटाला
वाटरशेड समिति ने अकेले इसी एक ग्राम पंचायत में 51 खेत तालाब स्वीकृत कर 2 करोड़ 81 लाख रुपए का बजट ठिकाने लगा दिया। आज स्थिति यह है कि यहां 95 प्रतिशत कार्य अपूर्ण हैं और 95 प्रतिशत तालाबों में धूल उड़ रही है, पानी का नामोनिशान नहीं है। वहीं, ढाबा गौतमान में हितग्राही अरुण गौतम के नाम पर 9 लाख 62 हजार रुपए के दो खेत तालाब स्वीकृत कर पैसे निकाल लिए गए, लेकिन वहां भी पानी की एक बूंद नहीं है।
लोकतंत्र के मंदिर (विधानसभा) में ‘सफेद झूठ’, विधायक भी मौन!
इस पूरे महाघोटाले का सबसे संगीन और हैरान करने वाला पहलू यह है कि इसमें प्रदेश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था ‘विधानसभा’ को भी गुमराह कर दिया गया। मऊगंज विधायक प्रदीप पटेल ने विधानसभा में प्रश्न क्रमांक 2131 के जरिए वॉटरशेड समिति के कार्यों की जानकारी मांगी थी। विभाग के भ्रष्ट अफसरों ने विधानसभा को लिखित जवाब भेज दिया कि “सिर्फ 4 तालाबों को छोड़कर शेष सभी कार्य पूर्ण हो चुके हैं और एजेंसियों से महज 1 लाख रुपए की कटौती की गई है।”
ऐसे में सवाल यह है कि जब आज भी दर्जनों तालाबों पर काम अधूरा है और कइयों पर काम चल रहा है, तो विधानसभा को ‘कार्य पूर्ण होने’ की गलत जानकारी किसके इशारे पर भेजी गई? विधानसभा को गुमराह करने वाले और झूठा प्रतिवेदन तैयार करने वाले दोषी अधिकारियों पर अब तक कार्यवाही क्यों नहीं हुई? स्थानीय विधायक प्रदीप पटेल ने विधानसभा से इतना बड़ा झूठ परोसे जाने के बाद भी जमीनी पड़ताल क्यों नहीं की? प्रश्न लगाने के बाद मिले इस फर्जी उत्तर पर वे मौन क्यों हो गए ?
डैम से बदल जाती सूरत
अगर इस 35 करोड़ 81 लाख रुपए की भारी-भरकम राशि का बंदरबांट करने के बजाय मऊगंज और हनुमना जनपद में दो बड़े बांध (डैम) बना दिए जाते, तो आज इस क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के हजारों किसानों की किस्मत बदल जाती। लेकिन अफ़सोस, अफ़सरों और वेंडरों की भूख ने किसानों के हक के पानी को सुखा दिया। देखना होगा कि इस ‘सुनियोजित महाघोटाले’ पर सूबे की सरकार कब जागती है और फाइलों में तैरने वाले इन तालाबों के दोषियों पर कार्यवाही कब करती है ?
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