लोक आस्था और सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व चैती छठ नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया है। छठ पर्व साल में दो बार आता है। एक कार्तिक मास में दीपावली के बाद और एक चैत्र मास में नवरात्रि के दौरान। चैत्र मास में आने वाले छठ पर्व को चैती छठ के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत सूर्य देव को समर्पित होता है। जिसमें व्रती कठोर नियमों का पालन करते हुए प्रकृति और सूर्य की आराधना करते हैं। हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि के बीच आने वाला यह पर्व विशेष महत्व रखता है। देश में बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में इसे गहरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
खरना आज, यहीं से शुरू होता है 36 घंटे का निर्जला व्रत
आज 23 मार्च, सोमवार को खरना के साथ व्रत का सबसे कठिन चरण शुरू हो रहा है। इस दिन व्रती महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। शाम को शुद्धता के साथ सूर्य देव और छठी मैय्या की पूजा के बाद गुड़ की खीर, रोटी और फल का भोग लगाया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रत लगातार परना तक चलता है। इस दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

संतान की प्राप्ति और परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है व्रत
चैती छठ की परंपरा महाभारत काल से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि अज्ञातवास के समय माता द्रौपदी ने पांडवों के कष्ट दूर करने के लिए सूर्य देव की उपासना की थी। तभी से यह परंपरा प्रचलित हुई। मिथिलांचल में सदियों से निभाई जा रही यह परंपरा अब कई क्षेत्रों में फैल चुकी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है। छठी मैय्या और सूर्य देव की पूजा से सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
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