भिवानी के गांव दिनोद निवासी जयभगवान को विवाह के आठ साल बाद कोर्ट से तलाक तो मिल गया, लेकिन वे अपने मानसिक और आर्थिक नुकसान को अपूरणीय बता रहे हैं। पीड़ित ने ससुराल पक्ष पर प्रताड़ना और सामान न लौटाने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
अजय सैनी, भिवानी। जिला भिवानी के गांव दिनोद निवासी जयभगवान के लिए वैवाहिक बंधन एक लंबी और कष्टकारी कानूनी लड़ाई का सबब बन गया। 17 फरवरी 2018 को गांव सूरजगढ़ की सोमवती के साथ हिंदू रीति-रिवाज से शुरू हुआ उनका दांपत्य जीवन महज 5 दिनों में ही बिखर गया। पीड़ित का आरोप है कि शादी के पांच दिन बाद ही उनकी पत्नी अपनी बुआ के प्रभाव में आकर मायके चली गई और बार-बार की कोशिशों के बावजूद कभी वापस नहीं लौटी। इसके बाद शुरू हुआ कोर्ट-कचहरी और आरोपों का वह सिलसिला, जिसने जयभगवान के जीवन के 8 महत्वपूर्ण वर्ष और मानसिक शांति छीन ली। अंततः, 15 अप्रैल 2026 को अदालत ने उन्हें तलाक की डिक्री दे दी, लेकिन पीड़ित का कहना है कि यह आजादी उन्हें बहुत बड़ी कीमत चुकाने के बाद मिली है।
झूठे मुकदमों का जाल और डिजिटल प्रताड़ना
जयभगवान ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अगस्त 2019 में घर बसाने (Section 9) के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन बदले में उन्हें दहेज और घरेलू हिंसा के मुकदमों का सामना करना पड़ा। पीड़ित का दावा है कि उन्हें मानसिक रूप से तोड़ने के लिए व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया गया। इतना ही नहीं, उन्हें विदेशी मोबाइल नंबरों से कॉल और मैसेज करवाकर डराया-धमकाया गया। समझौते के नाम पर उनसे 75 हजार रुपये की राशि भी ली गई, लेकिन बावजूद इसके न तो उनका घर बसा और न ही उनके गहने व शादी के एल्बम जैसे महत्वपूर्ण सामान वापस किए गए। इस प्रताड़ना के खिलाफ उन्होंने सीएम विंडो और साइबर थाने में भी गुहार लगाई, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
आर्थिक-मानसिक क्षति की भरपाई असंभव
तलाक मिलने के बाद भी जयभगवान खुद को पूरी तरह न्याय मिला हुआ महसूस नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि 18 अक्टूबर 2022 को दायर किए गए तलाक के केस का फैसला तो उनके पक्ष में आया है, लेकिन पिछले आठ वर्षों में जो आर्थिक और मानसिक नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। आज वे कानूनी रूप से आजाद तो हैं, लेकिन ससुराल पक्ष द्वारा समझौते की शर्तों का उल्लंघन कर सामान वापस न करना उनके लिए एक नया संघर्ष है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि उनके साथ हुए इस ‘अपूरणीय नुकसान’ और डिजिटल प्रताड़ना के मामले की निष्पक्ष जांच की जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य व्यक्ति को इस तरह के कानूनी दांव-पेचों में न फंसना पड़े।

