गोविंद पटेल, कुशीनगर. सरकार जहां एक ओर महिला आरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर इसकी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. इसका ताजा उदाहरण उस समय देखने को मिला जब कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित जिला स्तरीय विकास कार्य अनुश्रवण समिति की प्रथम बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष सावित्री जायसवाल स्वयं उपस्थित नहीं रहीं और उनकी जगह उनके पति प्रदीप जायसवाल प्रतिनिधि के रूप में बैठक में शामिल हुए.

बैठक में जिला स्तर के सभी अधिकारी और कर्मचारी भी बैठक में मौजूद रहे. जहां विकास कार्यों की समीक्षा और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की गई. लेकिन इस पूरी बैठक में सबसे बड़ा सवाल महिला आरक्षण को लेकर उठ खड़ा हुआ. जिस पद को महिला आरक्षित श्रेणी में रखा गया है, उस पर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि की गैरमौजूदगी और उनके स्थान पर उनके पति का बैठक में हिस्सा लेना, नीति और व्यवहार के बीच गहरे अंतर को उजागर करता है. स्थानीय स्तर पर इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. बताया जा रहा है कि ये कोई पहली बार नहीं है कि सावित्री जायसवाल बैठक में शामिल नहीं हुई हैं. उनकी जगह हमेशा उनके पति प्रदीप जायसवाल भी बैठकों में भाग लेते हैं.
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लोगों का कहना है कि यदि महिला आरक्षण केवल कागजों तक सीमित रह जाए और वास्तविक निर्णय पुरुष प्रतिनिधि लें, तो इसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है. यह स्थिति न सिर्फ महिला सशक्तिकरण की भावना को कमजोर करती है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है. विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण का असली उद्देश्य महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी दिलाना है, न कि उन्हें केवल औपचारिक चेहरा बनाकर पीछे से कोई और संचालन करे. अब बड़ा सवाल यह है कि क्या महिला आरक्षण की यह व्यवस्था सिर्फ ‘हवा-हवाई’ बनकर रह जाएगी या फिर इसे धरातल पर उतारने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे. प्रशासन और सरकार के लिए यह एक गंभीर चिंतन का विषय बन चुका है.
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