संजीव घनगस, सोनीपत. पार्किंसन डिजीज एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जो शरीर की मूवमेंट और संतुलन को प्रभावित करती है। यह तब होती है जब दिमाग की नर्व सेल्स धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगती हैं और डोपामिन का स्तर घट जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बीमारी हमेशा हाथ कांपने से शुरू नहीं होती, बल्कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर इतने हल्के होते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं।

न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती संकेतों में सबसे आम बदलाव मूवमेंट में धीमापन है। रोजमर्रा के काम जैसे बटन लगाना, चलना या कुर्सी से उठना मुश्किल लगने लगता है। इसके अलावा हाथ-पैरों में अकड़न, चलते समय एक हाथ का कम हिलना, सूंघने की क्षमता में कमी, नींद की समस्या और लगातार कब्ज जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। कई मरीजों में बिना कारण चिंता या उदासी भी शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

चूंकि ये लक्षण सामान्य समस्याओं जैसे तनाव या उम्र बढ़ने से मिलते-जुलते हैं, इसलिए अक्सर लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। यही कारण है कि भारत में पार्किंसन की पहचान देर से होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता और समय पर जांच बेहद जरूरी है।

पार्किंसन का कोई एक निश्चित टेस्ट नहीं है। इसकी पहचान न्यूरोलॉजिस्ट द्वारा लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और फिजिकल जांच के आधार पर की जाती है। हालांकि इसका स्थायी इलाज अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन आधुनिक दवाइयां लक्षणों को नियंत्रित करने में काफी मददगार हैं। नियमित व्यायाम, वॉक, योग और फिजियोथेरेपी से मरीज बेहतर जीवन जी सकते हैं। गंभीर मामलों में डीप ब्रेन स्टिम्यूलेशन जैसी उन्नत तकनीक भी कारगर साबित हो सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर पहचान और सही इलाज से मरीज लंबे समय तक सक्रिय और संतुलित जीवन जी सकते हैं। छोटे-छोटे लक्षणों को नजरअंदाज न करें, क्योंकि यही समय पर चेतावनी हो सकते हैं।