मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने विधानसभा के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में सरकारी प्रस्ताव पेश किया, जो ध्वनि मत से पारित हो गया। इस दौरान विपक्ष के वॉकआउट ने सदन में सियासी संग्राम तेज कर दिया है।

कृष्ण कुमार सैनी, चंडीगढ़। हरियाणा विधानसभा के विशेष सत्र में सोमवार को महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के समर्थन में सरकारी प्रस्ताव पेश किया। सदन ने इस ऐतिहासिक प्रस्ताव को ध्वनि मत से पारित कर दिया। मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव पेश करते हुए जोर दिया कि समाज का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब महिलाओं को समान अवसर और अधिकार प्राप्त हों। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत-2047’ के विजन का उल्लेख करते हुए महिलाओं को इस मिशन का आधारस्तंभ बताया और वर्ष 2023 में केंद्र द्वारा पारित अधिनियम को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण सुनिश्चित करने वाला मील का पत्थर करार दिया।

उपलब्धियों का उल्लेख और विपक्ष पर प्रहार

सदन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने हरियाणा में महिला सशक्तिकरण के आंकड़ों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राज्य में लिंगानुपात 871 से सुधरकर 923 तक पहुंच गया है और पंचायती राज संस्थानों में महिलाओं को 50% प्रतिनिधित्व देकर उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में शामिल किया गया है। सैनी ने ‘लखपति दीदी’, ‘उज्ज्वला’ और ‘ड्रोन दीदी’ जैसी योजनाओं की सफलता गिनाई। हालांकि, सत्र के दौरान माहौल तब गरमा गया जब कांग्रेस विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। मुख्यमंत्री ने इस पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि बाहर महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाली कांग्रेस का सदन के अंदर वॉकआउट करना उनके दोहरे चरित्र को दर्शाता है।

राजनीति से ऊपर उठने की अपील

मुख्यमंत्री सैनी ने विपक्ष के इस रवैये को महिलाओं के प्रति उदासीनता बताया और कहा कि विपक्ष के पास इस ऐतिहासिक प्रस्ताव का समर्थन कर एक सकारात्मक संदेश देने का सुनहरा अवसर था, जिसे उन्होंने गंवा दिया। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि जब महिलाओं को अधिकार देने की गंभीर चर्चा होती है, तो विपक्ष जिम्मेदारी से भाग खड़ा होता है। सत्र के अंत में मुख्यमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे तुच्छ राजनीति से ऊपर उठकर महिलाओं के सम्मान और भविष्य से जुड़े इस संकल्प का समर्थन करें। उन्होंने दोहराया कि यह प्रस्ताव मात्र एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि नारी शक्ति के प्रति राज्य की सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है।