Dharm Desk – हर महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी में एकदंत संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व कहां गया है. जो इस बार 5 मई मंगलवार को मनाई जाएगी. यह दिन भगवान गणेश के एकदंत स्वरूप की आराधना के लिए समर्पित होता है. खास बात यह है कि इस बार यह व्रत अंगारकी संकष्टी चतुर्थी के रूप में पड़ रहा है. जिसे शास्त्रों में अत्यंत शुभ और फल देने वाला कहा जाता है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत रखकर पूजा करने और चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलने से जीवन के सभी कष्ट, बाधाएं और संकट दूर हो जाते है. साथ ही गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त होती हैl पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि 5 मई सुबह 5:24 बजे से शुरू होकर 6 मई सुबह 7:51 बजे तक रहेगी, लेकिन चंद्रोदय के आधार पर व्रत 5 मई को ही रखा जाएगा.

एकदंत संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह के समय की बात है. विवाह की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थी. सभी देवी-देवताओं, गंधर्वों तथा ऋषि-मुनियों को निमंत्रण भेजा गया थ, लेकिन गणेश जी को इस विवाह में आमंत्रित नहीं किया गया. जब भगवान विष्णु की बारात निकली. तब देवताओं ने देखा कि गणपति उसमें शामिल नहीं हैं. इस पर जब भगवान विष्णु से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि भगवान शिव को निमंत्रण दिया गया है, यदि गणेश जी उनके साथ आना चाहें तो आ सकते हैं. साथ ही यह भी कहा गया कि गणेश जी अत्यधिक भोजन करते है. इसलिए उन्हें बुलाना कठिन होगा.

देवताओं ने दिया सुझाव

इस बात पर एक देवता ने सुझाव दिया कि गणेश जी को बुलाने के बजाय उन्हें विष्णुलोक की रक्षा के लिए वहीं छोड़ दिया जाए. सभी ने इस उपाय को स्वीकार कर लिया. गणेश जी ने देवताओं की बात मान ली, लेकिन वे भीतर से क्रोधित थे, तभी देवर्षि नारद जी वहां पहुंचे और उन्होंने गणेश जी से उनके उदास होने का कारण पूछा. गणेश जी ने पूरी बात बता दी. अपने क्रोध का कारण बताया. तब नारद जी ने उन्हें सलाह दी कि वे अपनी मूषक सेना को बारात के मार्ग में भेजकर रास्ता खुदवा दो. जिससे सभी को उनकी महत्ता का एहसास हो.

गणेश जी की आज्ञा पाकर चूहों की सेना ने रास्ते को भीतर से खोखला कर दिया. जब भगवान विष्णु का रथ उस मार्ग से गुजरा, तो वह जमीन में धंस गया. देवताओं ने बहुत प्रयास किया, लेकिन रथ को बाहर नहीं निकाल सके. तब नारद जी ने बताया कि यह विघ्न गणेश जी को क्रोधित करने के कारण आया है. इसलिए उन्हें प्रसन्न करना आवश्यक है.

ऐसे बने प्रथम पूज्य

सभी देवता गणेश जी के पास पहुंचे. उनकी विधिपूर्वक पूजा की और उनसे क्षमा मांगी. गणेश जी के प्रसन्न होते ही रथ गड्ढे से बाहर निकल आया, लेकिन उसके पहिए टूट चुके थ, फिर एक कारीगर को बुलाया गया, जिसने गणेश जी की वंदना करके रथ के पहियों को ठीक किया. इसके बाद सभी को यह समझ में आ गया कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी की पूजा करना अनिवार्य है. अंततः विवाह बिना किसी बाधा के संपन्न हुआ.