“कर्म प्रधान विश्व करि राखा ।
 जो जस करहि सो तस फल चाखा॥”

भारतीय राजनीति के बदले हुए परिदृश्य में विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक जीत रामचरित मानस के इस चौपाई को सजीव रूप में चरितार्थ कर रही है। इस चौपाई का अर्थ है कि यह संसार काम पर आधारित है और हर व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार ही फल भोगना पड़ता है सांक्षेप में कहें तो जैसा कर्म वैसा परिणाम।

पश्चिम बंगाल का विजय केवल मतों का गणित ही नही था बल्कि भाजपा के सत्तारूढ़ होने के पीछे पिछली सरकार के लिए जन आक्रोश, सत्ता विरोधी लहर के साथ बीजेपी की वर्षों की रणनीति, संगठन की शक्ति और कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम का हाथ है। पश्चिम बंगाल की राजनीति ने जिस तरह ऐतिहासिक करवट ली है वो केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि बदलते भारत की नई तस्वीर है। पश्चिम बंगाल की यह जीत वैसी ही है जैसे स्वाद के कई आयाम में पगा बंगाल का प्रसिद्ध “बंगला पान”। इस बार बंगला पान में छत्तीसगढ़ के नेताओं के श्रम, रणनीति और समर्पण की सुगंध भी घुली हुई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस जीत को 140 करोड़ देशवासियों की जीत मानते हैं” उनका यह वक्तव्य उस व्यापक जनभावना का प्रतीक है जो अब क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सोच में बदल रही है। पश्चिम बंगाल जिसे आरम्भ से ही भाजपा के लिए अभेद्य राजनीतिक किला माना जाता रहा वहीं भाजपा की इस विजय ने यह साबित कर दिया कि संगठन मजबूत हो, रणनीति स्पष्ट हो और नेतृत्व दूरदर्शी हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं। इस पूरे अभियान में छत्तीसगढ़ के नेताओं ने “अनदेखे नायक” की भूमिका निभाई है।

बंगाल फतह में छत्तीसगढ़िया रणबाँकुरों ने दिखाया अपना जौहर

छत्तीसगढ़ के संगठन मंत्री पवन साय, गृहमंत्री विजय शर्मा, मंत्री दयाल दास बघे, वरिष्ठ नेता सौरभ सिंह, अनुराग सिंहदेव, महेश गागड़ा जैसे नेताओं ने बंगाल के महायज्ञ में जो आहुति दी है वह लिखे जाने वाले इतिहास में भी अमर हो गया। पवन साय द्वारा 56 से अधिक सीटों की जिम्मेदारी संभालने और सौरभ सिंह का कोलकाता जैसे संवेदनशील शहरी क्षेत्र में 52 सीटों पर संगठन को मजबूत करने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने जैसा बुनियादी प्रयास यह सिद्ध करता है कि जीत केवल भाषणों से नहीं बल्कि ज़मीनी मेहनत से हासिल होती है।

छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा की विशेष भूमिका, केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनका समन्वय, रणनीति निर्माण और अभियान संचालन में उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के उभरते चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया है। चर्चा तो ऐसी भी ही कि अब नितिन नबीन की नई टीम में इन नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।

बंगाल में केसरिया लहर

इस चुनाव के तीन प्रमुख ‘X-फैक्टर’ रहे पहला, वोटर लिस्ट का मुद्दा, दूसरा, महिलाओं के लिए आर्थिक वादे और सत्ता विरोधी लहर और तीसरा, 91 लाख के क़रीब मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का मुद्दा जो राजनीतिक बहस के केंद्र में भी रहा। बीजेपी ने इसे “शुद्धिकरण अभियान” बताया और विपक्ष ने इसे साजिश कहा। लेकिन इस विवाद ने चुनावी ध्रुवीकरण को नई दिशा देने में अपनी महती भूमिका निभाई है।

‘X-फैक्टर’ के दूसरे बड़े कारक महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण था जिसमें भाजपा ने महिलाओं को प्रति माह 3000 रुपये देने का वादा किया यह रणनीति छत्तीसगढ़ के महतारी वंदन योजना से प्रेरित थी, छत्तीसगढ़ में योजनाओं का लाभ सीधे घर-घर तक पहुंचाने की परंपरा रही है। पश्चिम बंगाल में कार्यकर्ताओं ने जिस तरह घर-घर जाकर इस योजना के फॉर्म भरवाए उसने इस वादे को भरोसे में बदलने का काम किया।

तीसरे ‘X-फैक्टर’ सत्ता विरोधी लहर में लगभग डेढ़ दशक की सरकार के खिलाफ जनता में बदलाव की चाह स्पष्ट रूप से दिखाई दी। पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों को जिस आक्रामकता से उठाया गया थे उसने चुनावी माहौल को पूरी तरह से बदलने का काम किया।

जनादेश देकर जन-जन ने दिखाया भाजपा नेतृत्व पर विश्वास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में भी इस जीत की व्यापकता और भविष्य का बंगाल स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में पश्चिम बंगाल की जनता को आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि “सरकार का फोकस गरीब, किसान, युवा और महिला सशक्तिकरण पर रहेगा। “विकसित भारत” का लक्ष्य अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक ठोस राजनीतिक और आर्थिक एजेंडा बन चुका है।” उन्होंने आने वाले समय की कार्ययोजना का संकेत देते हुए डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को और मजबूत करने की बात कही है। चुनावी नतीजों के बाद उन्होंने अपने सबोधन में कहा “इस जीत के साथ जिम्मेदारियां भी उतनी ही बढ़ गई हैं। भाजपा लंबे समय से बंगाल में घुसपैठ के मुद्दे को उठाती रही है। अब जब राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर उसकी भूमिका निर्णायक है, तो जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ेंगी। केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके समाधान भी उतनी ही प्रभावी ढंग से लागू करने होंगे।”

बंगाल के बदलते गणित में राष्ट्रवाद और विकास ने लिखी नई इबारत

इस विधान सभा चुनाव से यह भी संकेत मिला है कि भारतीय राजनीति अब “राज्य बनाम राज्य” की सीमाओं से आगे बढ़कर “राष्ट्रव्यापी रणनीति” की दिशा में बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ जैसे सुदूर राज्य के नेताओं का बंगाल जैसे दूरस्थ क्षेत्र में जाकर चुनाव प्रचार में प्रभावी भूमिका निभाना इस नए राजनीतिक युग की पहली आहट बनी है। असम के चुनाव में भी भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली है। यहां भी छत्तीसगढ़ भाजपा के राष्ट्रीय संगठन ने प्रदेश के नेताओं को बड़ा ज़िम्मा दिया था। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री अरुण साव, वित्त मंत्री ओपी चौधरी, केंद्रीय मंत्री तोखन साहू के अलावा दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने वहाँ चुनावी रणनीति बनाने का काम किया। इन जीतों को दलगत विजय नही कहा जा सकता क्योंकि यह विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देने वाली विचारधारा की जीत है। रसीले बंगला पान की तरह इस विजय का स्वाद भी बहुआयामी है जिसमें शामिल है रणनीति का सोंधापन, मेहनत की मिठास और जनता के विश्वास की केसरिया सुगंध। अब देखना यह होगा कि क्या यह जीत “विकसित भारत” के संकल्प को नई गति दे पाती है।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक न्यूज़ 24 /लल्लूराम डॉट कॉम

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