हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में POCSO कानून के कथित दुरुपयोग से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है। जिला न्यायालय ने लगभग दो साल चले ट्रायल के बाद आरोपी युवक को दोषमुक्त करते हुए शिकायतकर्ता युवती के बयानों और पुलिस जांच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कोर्ट ने साफ कहा कि मामले में कई महत्वपूर्ण साक्ष्य पेश ही नहीं किए गए और शिकायतकर्ता के बयान भी विश्वसनीय नहीं पाए गए।
युवक पर पीछा कर POCSO एक्ट की लगाई धाराएं
मामला तुकोगंज थाना क्षेत्र का है। यहां एक नाबालिग युवती ने जून 2023 में युवक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। युवती ने आरोप लगाया था कि युवक उसका पीछा करते हुए घर में घुस आया, गले में हाथ डालकर जबरन सेल्फी लेने लगा और विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने मामला दर्ज करते हुए आरोपी पर छेड़छाड़, धमकी और POCSO एक्ट की गंभीर धाराएं लगा दीं।
लड़की की स्नैपचैट ने खोल दी पोल
लेकिन कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई तो पूरा मामला ही पलटता नजर आया। आरोपी पक्ष के हाई कोर्ट एडवोकेट कृष्ण कुमार कुन्हारे और डॉ रूपाली राठौर ने दावा किया कि युवक और युवती के बीच लंबे समय से प्रेम संबंध थे। आरोपी पक्ष ने स्नैपचैट चैट और बातचीत भी कोर्ट में पेश की। शुरुआत में युवती ने प्रेम प्रसंग से इनकार किया, लेकिन जिरह के दौरान युवती की मां ने दोनों के रिश्ते की बात स्वीकार कर ली।
शिकायतकर्ता के बयान नहीं लगे भरोसेमंद
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि युवती घटना की तारीख तक बदलती रही। FIR में घटना 18 मई 2023 की बताई गई, जबकि कोर्ट में दूसरी तारीख बताई गई। इस विरोधाभास को कोर्ट ने गंभीर माना। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने बयान “अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर” पेश किए हैं और उसके बयान पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं।
कथित सेल्फी पर उठा सवाल
मामले का सबसे बड़ा सवाल उस कथित सेल्फी पर उठा जिसे पूरी घटना का आधार बताया गया था। कोर्ट ने पूछा कि जब सेल्फी घटना का मुख्य आधार थी तो पुलिस ने वह फोटो या मोबाइल जब्त क्यों नहीं किया। रिकॉर्ड में इसका कोई जवाब नहीं मिला। यही नहीं, युवती ने युवक पर भाई का मोबाइल तोड़ने का आरोप लगाया था, लेकिन वह मोबाइल भी पुलिस ने जब्त नहीं किया।
पुलिस जांच पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
कोर्ट ने पुलिस जांच पर भी तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताए गए युवती के भाई को गवाही के लिए कोर्ट में पेश ही नहीं किया गया। जबकि वही इस केस का सबसे महत्वपूर्ण गवाह था। कोर्ट ने माना कि अगर भाई को पेश किया जाता तो संभव है कि वह पुलिस की कहानी के खिलाफ बयान देता।
कोर्ट ने युवक को किया बरी
लगभग दो साल चले ट्रायल के बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी युवक ने युवती का लैंगिक उत्पीड़न किया, उसकी लज्जा भंग की या उसे धमकाया। पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने और पुलिस जांच में गंभीर खामियां मिलने पर कोर्ट ने आरोपी युवक को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
इस फैसले के बाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या गंभीर कानूनों का इस्तेमाल निजी विवाद और प्रेम प्रसंग के मामलों में हथियार की तरह किया जा रहा है। वहीं कोर्ट की टिप्पणियों ने पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
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