रायपुर. सुबह की पहली किरण जैसे ही रायगढ़ जिले के संबलपुरी गांव की पगडंडियों पर उतरती थी, एक परिवार जंगल की ओर निकल पड़ता था. उस परिवार के साथ एक दुबला-पतला लड़का भी चलता जो कभी तेंदूपत्ता तोड़ता, कभी महुआ बीनता. उसे तब शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि एक दिन यही जंगल उसकी पहचान बन जाएगा. उस लड़के का नाम था, अजय गुप्ता. आज वही अजय गुप्ता भारतीय वन सेवा (IFS) परीक्षा में पूरे देश में 91वीं रैंक हासिल कर चुका है. जिस जंगल से कभी उसके परिवार का चूल्हा जलता था, अब उसी जंगल की हिफाज़त की जिम्मेदारी उसके कंधों पर आने वाली है. यह सिर्फ अजय गुप्ता की सफलता की कहानी नहीं है. यह कहानी ग्रामीण अंचलों के कच्ची मिट्टी के घर में बसते संघर्ष की है, जहां तमाम अभावों के बाद भी सपने जिंदा रहते हैं.

अजय गुप्ता का बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि बड़े सपने देखे जा सके. घर कच्ची मिट्टी और खपरैल का था. छत के बीच से आती धूप की किरणें जिंदगी में कभी-कभी उम्मीद की रोशनी भर देती थी. परिवार साल के छह महीने खेती करता और गर्मी के मौसम में जंगलों से तेंदूपत्ता तोड़कर गुजारा करता था. दो जून की रोटी जुटाने के लिए पूरे परिवार को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती थी. गर्मी की छुट्टी के दिनों सुबह होते ही अजय भी अपने माता-पिता के साथ जंगल निकल जाते थे. अजय का बचपन तेंदूपत्ता तोड़ने, महुआ बीनने और खेती किसानी के मौसम में खेतों में काम करते हुए बीतता. इस संघर्षों के बीच भी उनके माता-पिता ने एक सपना कभी मरने नहीं दिया. वह सपना था, अपने बच्चों की पढ़ाई का.माता-पिता निरक्षर थे, मगर शिक्षा की ताकत को समझते थे. जिंदगी भर जो कमाया, उससे परिवार का पेट भी भरा और बच्चों की पढ़ाई भी चलती रही.

कैसे बदली जिंदगी?

अजय पढ़ाई में शुरू से ही बेहद मेधावी रहे. साल 2011 में उन्होंने 10वीं कक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल किए. यह उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुआ. तेंदूपत्ता संग्राहक परिवारों के बच्चों के लिए सरकार ने छात्रवृत्ति योजना शुरू की थी. अजय को इस योजना का लाभ मिला और आगे की पढ़ाई का रास्ता आसान हुआ. उन्होंने 12वीं कक्षा में भी शानदार प्रदर्शन किया और इसके बाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर में प्रवेश मिला. एनआईटी में पढ़ाई के दौरान भी उन्हें तीन वर्षों तक छात्रवृत्ति मिलती रही.अजय कहते है- पहले सपने बहुत बड़े नहीं थे. लगता था कि हमारी दुनिया बस गांव तक सीमित है, लेकिन एनआईटी में एडमिशन लेने के बाद नजरिया बदल गया. पहली बार लगा कि मैं भी कुछ बड़ा कर सकता हूं.

नौकरी मिली, लेकिन मन कुछ और चाहता था

एनआईटी में पढ़ाई के दौरान ही अजय को कैंपस प्लेसमेंट मिला. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह बस्तर में काम कर रही संस्था ‘प्रदान’ से जुड़ गए. यहां उन्होंने आदिवासी समुदायों के बीच चार वर्षों तक काम किया. लाइवलीहुड, एग्रीकल्चर और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में काम करते हुए उन्होंने आदिवासियों के जीवन और जंगल के रिश्ते को बेहद करीब से समझा. बस्तर के अनुभवों ने उनके भीतर समाज और प्रकृति के लिए कुछ बड़ा करने की इच्छा को और मजबूत किया.

नौकरी छोड़ी और शुरू हुआ असली संघर्ष

साल 2021 में अजय ने बड़ा फैसला लिया. उन्होंने नौकरी छोड़ दी और UPSC की तैयारी शुरू कर दी. यह रास्ता आसान नहीं था. उन्होंने चार बार मेन्स परीक्षा लिखी और तीन बार इंटरव्यू तक पहुंचे. हर बार मंज़िल सामने दिखती, लेकिन सफलता हाथ से फिसल जाती, लेकिन अजय ने हार नहीं मानी. क्योंकि संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा पहले से था.

पहले IRS के लिए चुने गए

साल 2025 अजय गुप्ता की जिंदगी में नई करवट लेकर आया. उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया 452वीं रैंक हासिल की और भारतीय राजस्व सेवा के लिए चयनित हुए. परिवार और गांव में खुशी का माहौल था, लेकिन इसके तुरंत बाद इंडियन फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा का परिणाम भी आया. देशभर में 91वीं रैंक मिली. अब उनके सामने दो रास्ते थे, IRS या IFS, लेकिन अजय के लिए फैसला मुश्किल नहीं था. उन्होंने भारतीय राजस्व सेवा की बजाय भारतीय वन सेवा को चुना. क्योंकि जंगल उनके लिए सिर्फ पेड़ नहीं थे, जिंदगी थे. अजय कहते हैं कि जंगल उनके बचपन से ही जिंदगी का हिस्सा रहा है. जंगल ने उन्हें सिर्फ रोजगार नहीं दिया, बल्कि जीवन की दिशा भी दी. वह कहते हैं, बचपन से मेरा जुड़ाव जंगल से रहा है. जंगल ने मुझे बहुत कुछ दिया है. बस्तर में काम करने के दौरान भी जंगल से रिश्ता और मजबूत हुआ. शायद इसलिए मैंने भारतीय वन सेवा को चुना.

सपने देखने की हिम्मत भी नहीं थी

अजय कहते हैं कि बचपन में उन्होंने कभी बहुत बड़े सपने नहीं देखे थे. हमारी परिस्थितियां ऐसी थीं कि बड़े सपने देखने की न तो हिम्मत थी और न ही हैसियत, लेकिन पढ़ाई ने सोच बदल दी. वह बताते हैं कि संघर्षों के बीच गुजरी जिंदगी ने उन्हें मजबूत बनाया. उनका मानना है कि युवाओं को मेहनत करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए. वे कहते हैं, खुद की परिस्थितियों से शिकायत मत कीजिए. मेहनत करते रहिए. सहयोग अपने आप मिलता जाएगा. अगर कोई आर्थिक मदद नहीं कर पाएगा, तो मार्गदर्शन जरूर देगा.

झिझक मत रखिए

अजय युवाओं को सलाह देते हैं कि अगर किसी अफसर को देखकर उनके जैसा बनने का सपना आए, तो उनसे मिलने में कभी झिझकना नहीं चाहिए. वे कहते हैं कि अगर किसी कलेक्टर या एसपी को देखकर लगे कि उनके जैसा बनना है, तो उनसे पूछिए कि वहां तक कैसे पहुंचा जा सकता है. उनके दफ्तर जाइए. एक दिन मुलाकात न हो तो दूसरे दिन जाइए. तब तक कोशिश मत छोड़िए, जब तक उनसे मुलाकात न हो जाए.

भाई डॉक्टर, बहन इंजीनियर

अजय बताते हैं कि उनके माता-पिता ने हमेशा बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी. आज उनका भाई एमबीबीएस डॉक्टर है और नवरंगपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर के रूप में सेवा दे रहा है. वहीं उनकी बहन इंजीनियर है और रायगढ़ के जिंदल स्टील प्लांट में सीनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत है. एक कच्ची मिट्टी के घर से निकले तीन बच्चों ने अपनी मेहनत से अपनी-अपनी दुनिया बदल दी.

अफसरों का मिला साथ

अजय अपनी सफलता का श्रेय केवल मेहनत को नहीं देते. वे मानते हैं कि सही समय पर मिला मार्गदर्शन भी बेहद महत्वपूर्ण था. उन्होंने बताया कि कई अधिकारियों ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया. विशेष रूप से आईएफएस मयंक अग्रवाल और आईएएस रजत बंसल की भूमिका उनके जीवन को दिशा देने में अहम रही. अजय गुप्ता की कहानी उन लाखों बच्चों की कहानी है, जो अभावों के बीच बड़े हो रहे हैं. जिनके पास संसाधन कम हैं, लेकिन सपने बड़े हैं. उनकी यात्रा यह बताती है कि गरीबी इंसान की शुरुआत तय कर सकती है, मंज़िल नहीं.