नवीन शर्मा, हांसी। पेड़े अपनी खास मिठास और देसी स्वाद के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इन स्वादिष्ट पेड़ों का नाम सुनते ही लोगों के मुंह में पानी आ जाता है। यहाँ के पेड़ों की खासियत उनका मुलायम बनावट, शुद्ध खोया और पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाना है, जिसकी वजह से विदेशों तक इनकी पहचान बनी हुई.यहां का पेड़ा पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसी हस्तियों को भी पसंद रहे हैं। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इंजमाम उल-हक ने यहां के पेड़े को खूब सराहा है। इंजमाम के दादा-परदादा हरियाणा के हांसी में रहते थे। आम लोग ही नहीं राजनीति के बड़े से बड़े नेता भी इसका स्वाद चख चुके है।
खास बात यह है कि हांसी का पेड़ा बनाने की पारंपरिक विधि आज भी बरकरार है। धीमी आंच पर घंटों तक दूध को पकाकर तैयार दानेदार यह पेड़ा अपनी खुशबू और स्वाद के कारण लोगों की पहली पसंद बना हुआ है। यह पेड़ा बहुत नरम और ताजा होता है, जो मुंह में घुल जाता है। आज़ादी के बाद भले ही हांसी का नाम इतिहास के पन्नों में सिमट गया हो, लेकिन यहां के पेड़ों के लाजवाब ज़ायके ने इस शहर को नई पहचान दिलाई है।
हांसी के मशहूर पेड़े खरीदने के लिए भरोसा जताते
आपको बता दे कि, लाला दुनी चंद छबील दास की करीब 150 साल पुरानी दुकान पर आज भी लोग हांसी के मशहूर पेड़े खरीदने के लिए भरोसा जताते हैं। कहा जाता है कि हाँसी के पेड़ों को असली पहचान दिलाने में इस दुकान की सबसे बड़ी भूमिका रही है। यही वजह है कि यहां की हलवाई वाली गली भी दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गई। वर्षों पुरानी पारंपरिक विधि और शुद्ध स्वाद ने इस दुकान को लोगों की पहली पसंद बना दिया.
हाँसी की हलवाई वाली गली का नाम पेड़े से प्रसिद्ध
लाला दुनीचंद छबील दास की प्रसिद्धि और यहां बनने वाले स्वादिष्ट पेड़ों के कारण ही हाँसी की हलवाई वाली गली का नाम इसी कारण प्रसिद्ध हुआ. लाला दुनी चंद छबील दास की अब पांचवी पीढ़ी इस काम में लगी हुई है। अब इन्होंने पुरानी दुकान के साथ साथ हांसी में कही जगह दुकानें खोल रखी है। लाला दुनीचंद मित्तल के दत्तक पुत्र लाला छबीलदास ने भी इस मिठास भरी विरासत को आगे बढ़ाया।
गांव से 20वीं सदी के प्रथम दशक में हांसी आए
उनके पड़पोता दीपक मित्तल ने बताया कि परदादा लाला दुनी चंद मित्तल राजस्थान के नीम का थाना क्षेत्र के एक गांव से 20वीं सदी के प्रथम दशक में हांसी आए थे। इसके बाद उन्होंने यहां पेड़ों का ऐसा स्वाद तैयार किया.हांसी ही नहीं बल्कि देशभर से आने वाले लोग यहां के पेड़े का स्वाद चखते हैं। अमेरिका में बसे लोग भी हांसी के इस प्रसिद्ध पेड़े को खास तौर पर मंगवाते हैं. आज बस स्टैंड पर भी यह दुकान 30 वर्ष पुरानी हैं. लोग बड़े चाव से इस पेड़े का स्वाद चखते है.
हांसी का प्रसिद्ध पेड़ा आज अमेरिका तक पहुंच चुका
वही दुलीचंद के पोते 80 वर्षीय ईश्वर दत्त ने बताया कि हांसी का प्रसिद्ध पेड़ा आज अमेरिका तक पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1968 से वह स्वयं इस दुकान पर काम संभाल रहे हैं। और अब उनकी पांचवीं पीढ़ी भी इस पारंपरिक कारोबार को आगे बढ़ा रही है। ईश्वर दत्त के अनुसार, वर्षों बीत जाने के बावजूद उनकी फर्म ने स्वाद और शुद्धता के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। यही वजह है कि आज भी देश-विदेश से लोग खास तौर पर हांसी के पेड़े मंगवाते हैं।

