रायपुर। वो कहते हैं न कभी महक की तरह हम गुलों से उड़ते हैं, कभी धुंए की तरह पर्बतों से उड़ते हैं.. ये कैंचियां हमें उड़ने से ख़ाक रोकेंगी, की हम परों से नहीं… हौंसलों से उड़ते हैं. डॉ. राहत इंदौरी कि ये लाइनें अबूझमाड़ के सुखराम के लिए फिट बैठती हैं, जो अपने आपको साबित किया है. अपने हौंसले से लाख बाधाओं को पार कर मुश्किलों से लड़कर उम्मीदों की कहानी गढ़ी है.

दरअसल, आईपीएस उदय किरण 2020 में जब नारायणपुर में पदस्थ थे, तो अपने माता-पिता के साथ एक युवक सुखराम मंडावी मदद के लिए आया था. उसे किसी ने बताया था कि एसपी साहब तुम्हारी सहायता कर सकते हैं. 2008 में सुखराम का दायां हाथ एक दुर्घटना में कंधे से अलग हो गया था. इस वजह से पारंपरिक कृत्रिम हाथ लगा देने से वह उनसे काम नहीं ले सकता था.

उदय किरण ने विकल्पों की तलाश की.  उन्हें जानकारी मिली कि दिल्ली की एक संस्था इस तरह के हाथ बनाती है जिनमें इलेक्ट्रानिक सेंसर होता है और मष्तिष्क से मिलने वाले निर्देश के अनुसार मूवमेंट कर सकता है, लेकिन इसकी कीमत 6 लाख रुपये थी. उन्होंने सहायता के लिए कुछ कंपनियों से चर्चा की.

निको जायसवाल आयरन ओर लिमिटेड ने कहा कि वे सीएसआर मद से रुपये तो खर्च करते हैं, लेकिन किसी एक व्यक्ति के लिये इतना अधिक व्यय करने का नियम नहीं है. इस पर उदय किरण ने इस मामले में नियम शिथिल करने का आग्रह किया. कंपनी मान गई और उसने बजट स्वीकृत कर दिया.

इसके बाद सुखराम को दिल्ली ले जाया गया, पहली बार हाथ का नाप लिया गया, दूसरी बार तैयार किया गया. कृत्रिम हाथ लगा दिया गया. सुखराम पहले ट्रैक्टर चलाता था, कृत्रिम हाथ से वह फिर यह काम करने लग गया है. अब सुखराम मंडावी हाथ लग जाने के बाद सभी तरह का काम कर लेते हैं.

एक ऐसा युवक जो सुदूर अबूझमाड़ से आता है और जिसका परिवार गरीबी में दिन गुजारता है, 6 लाख रुपये का अत्याधुनिक कृत्रिम हाथ लगवा पाना एक सपने के जैसा था. इस बारे में चर्चा करने पर उदय किरण ने कहा कि वे यथासंभव लोगों को छोटी-मोटी मदद तो करते हैं, लेकिन सुखराम मंडावी को आउट ऑफ वे जाकर जिस तरह से नया कृत्रिम हाथ मिला उससे उन्हें काफी सुकून है.

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