Dharm Desk – देशभर में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष धार्मिक महत्व है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में ऐसा प्राचीन शिव मंदिर भी है। जिसे धार्मिक परंपरा में ‘ज्योतिर्लिंगों का राजा’ कहा जाता है? यहां भगवान शिव लिंगराज के रूप में विराजमान हैं और उनकी पूजा हरिहर स्वरूप में होती है यही वहज है कि यह मंदिर शिव और विष्णु उपासना के अद्भुत संगम के लिए भी जाना जाता है।

लिंगराज मंदिर में विराजते हैं ‘हरिहर’
भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर ओडिशा के सबसे प्रमुख और प्राचीन मंदिरों में गिना जात है। यहां विराजमान शिवलिंग को स्वयंभू है। ओडिशा पर्यटन विभाग के अनुसार, लिंगराज का स्वरूप हरिहर के नाम से जाना जाता है, जो शैव और वैष्णव परंपराओं के समन्वय को दर्शाता है। ‘हर’ भगवान शिव और ‘हरि’ भगवान विष्णु के लिए प्रयुक्त नाम हैं।
पूजा-पद्धति शिव मंदिरों से अलग
इसी हरिहर स्वरूप की वजह से इस मंदिर की पूजा-पद्धति भी अन्य शिव मंदिरों से अलग मानी जाती है। धार्मिक परंपरा में यहां भगवान लिंगराज को 12 ज्योतिर्लिंगों के राजा के रूप में संबोधित किए जाने की बात कही जाती है। हालांकि, यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि लिंग राज मंदिर भारत की मानक द्वादश ज्योतिर्लिंग सूची में शामिल नहीं है।
परिसर में हैं 150 से अधिक छोटे-बड़े मंदिर
लिंगराज मंदिर की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके विशाल परिसर में करीब 150 सहायक मंदिर हैं। पूरा मंदिर परिसर कलिंग वास्तुकला की विशिष्ट देउला शैली का शानदार उदारहण है। मुख्य मंदिर का विमान करीब 180 फीट यानी 55 मीटर ऊंचा है।
मंदिर की संरचना मुख्य रूप से चार हिस्सों में विभाजित है—विमान या गर्भगृह, जगमोहन, नाट्य मंडप और भोग मंडप। ये चारों हिस्से मंदिर की धार्मिक परंपरा और कलिंग स्थापत्य की विशेषता को दर्शाते हैं।
11वीं शताब्दी में तैयार हुआ भव्य मंदिर
वर्तमान लिंगराज मंदिर की संरचना का संबंध 11वीं शताब्दी से बताया जाता है, ओडिशा सरकार के धार्मिक बंदोबस्ती विभाग के अनुसार, इसका निर्माण सोमवंशी शासकों से जुड़ा है और मंदिर के निर्माता के रूप में जजाति केशरी का उल्लेख मिलता है। वहीं ओडिशा सरकार के खोरधा जिला इतिहास में लिंगराज मंदिर को सोमवंशी शासक ययाति द्वितीय और उनके पुत्र से जोड़ा गया है।
शिव को चढ़ता है तुलसी दल!
लिंगराज मंदिर की सबसे चर्चित विशेषताओं में इसकी हरिहर उपासना भी शामिल है। सामान्य शिव पूजा में जहां तुलसी दल का प्रयोग नहीं किया जाता, वहीं लिंगराज के हरिहर स्वरूप को लेकर यहां तुलसी अर्पण किए जाने की धार्मिक परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसे शिव और विष्णु के संयुक्त स्वरूप से जोड़ा जाता है।यही वजह है कि भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर केवल भगवान शिव की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि शैव और वैष्णव परंपराओं के संगम का अद्भुत प्रतीक भी माना जाता है।


