लखनऊ. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि लैंगिक हमले की पीड़िता को केवल मेडिकल रिपोर्ट में चोट के निशान नहीं मिलने के आधार पर मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष के तहत पीड़िता को तीन लाख रुपये देने का आदेश दिया है. साथ ही, प्रमाणित आदेश पेश किए जाने के 10 दिन के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है.
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दो जजों की पीठ ने सुनाया फैसला
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि मुआवजा अपराध का शिकार होने के कारण दिया जाता है. इसके लिए शरीर पर चोट के निशान होना जरूरी नहीं है. ऐसी योजनाओं का उद्देश्य पीड़िताओं की आर्थिक मदद करना और उनके आघात को कम करना है. इसलिए इनकी व्याख्या उदारता से होनी चाहिए.
मुआवजा रोकने का फैसला निरस्त
पीड़िता के पिता ने जिला संचालन समिति के फैसले को चुनौती दी थी. समिति ने मेडिकल रिपोर्ट में प्रवेशात्मक लैंगिक हमले की पुष्टि नहीं होने का हवाला देकर मुआवजा देने से इनकार कर दिया था. राज्य सरकार ने भी समिति के फैसले का बचाव किया. हालांकि, हाईकोर्ट ने इस निर्णय को कानून और योजना के प्रावधानों के विपरीत माना और इसे निरस्त कर दिया.
2022 में दर्ज हुई थी एफआईआर
मामले के अनुसार, सरोजनीनगर थाने में 7 दिसंबर 2022 को एफआईआर दर्ज की गई थी. इसके बाद 13 जनवरी 2023 को आरोपपत्र दाखिल किया गया. योजना के तहत पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के अपराध में कुल तीन लाख रुपये मुआवजे का प्रावधान है.
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चोट के निशान नहीं होना हमले से इनकार का आधार नहीं
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत प्रवेशात्मक लैंगिक हमले के लिए शारीरिक चोट होना अनिवार्य नहीं है. मेडिकल रिपोर्ट में चोट नहीं मिलने से घटना को खारिज नहीं किया जा सकता. पीठ ने कहा कि एफआईआर और आरोपपत्र में संबंधित अपराध का उल्लेख होने पर केवल चोट के अभाव में मुआवजा रोकना उचित नहीं है. कोर्ट ने पीड़िता को राहत देते हुए जल्द भुगतान का निर्देश दिया.

