अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से खुद को आधिकारिक रूप से अलग कर लिया है। इस फैसले की पुष्टि अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग और विदेश विभाग ने संयुक्त बयान जारी कर की। इसके साथ ही स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा स्थित WHO मुख्यालय के बाहर से अमेरिका का राष्ट्रीय झंडा भी हटा दिया गया है। अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वह WHO के साथ अब केवल सीमित स्तर पर ही काम करेगा, ताकि संगठन से अलग होने की कानूनी प्रक्रिया को पूरा किया जा सके। यह कदम अमेरिका और WHO के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के बाद उठाया गया है।

अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की न तो WHO में पर्यवेक्षक (ऑब्ज़र्वर) के रूप में बने रहने की कोई योजना है और न ही भविष्य में दोबारा सदस्य बनने का इरादा। अधिकारी के अनुसार, अमेरिका अब WHO से केवल सीमित स्तर पर संपर्क बनाए रखेगा, ताकि संगठन से अलग होने की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जा सके।

अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से अलग होने के पीछे कोविड-19 महामारी के दौरान संगठन के कथित कमजोर प्रबंधन को वजह बताया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि महामारी से निपटने में WHO की नीतियां और कार्यप्रणाली प्रभावी नहीं रहीं, जिससे अमेरिका को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। प्रशासन के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की इस स्वास्थ्य एजेंसी की कार्यशैली अमेरिका के हितों के अनुरूप नहीं थी, इसी कारण WHO से अलग होने का फैसला लिया गया।

यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब बीते एक साल से स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे थे कि अमेरिका के WHO से बाहर निकलने से न केवल अमेरिका बल्कि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बीमारी की निगरानी, महामारी से निपटने और टीकाकरण जैसे कार्यक्रम कमजोर हो सकते हैं। हालांकि अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि WHO से औपचारिक रूप से अलग होने की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक वह संगठन के साथ सीमित स्तर पर सहयोग जारी रखेगा।

गौरतलब है कि अमेरिकी कानून के तहत WHO से बाहर निकलने के लिए एक साल पहले औपचारिक सूचना देना और सभी बकाया सदस्यता शुल्क का भुगतान करना अनिवार्य होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अमेरिका पर करीब 26 करोड़ डॉलर का बकाया है। WHO के प्रवक्ता ने बताया कि अमेरिका ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए अब तक अपना बकाया शुल्क जमा नहीं किया है। इस मुद्दे को लेकर अमेरिका और WHO के बीच मतभेद बने हुए हैं।

वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि अमेरिकी जनता पहले ही WHO को पर्याप्त भुगतान कर चुकी है और इस दावे को खारिज किया कि संगठन छोड़ने से पहले सभी बकाया चुकाना कानूनी रूप से अनिवार्य है। दूसरी ओर, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के ओ’नील इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ लॉ के संस्थापक निदेशक लॉरेंस गोस्टिन ने अमेरिका के इस कदम को अमेरिकी कानून का स्पष्ट उल्लंघन बताया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक और कानूनी परिस्थितियों को देखते हुए पूरी संभावना है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस मामले में जवाबदेही से बच निकलें।

इस बीच अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग (HHS) ने घोषणा की है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को दी जाने वाली सभी अमेरिकी फंडिंग पूरी तरह समाप्त कर दी गई है। HHS के एक प्रवक्ता के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने विशेष कार्यकारी अधिकारों का उपयोग करते हुए भविष्य में WHO को किसी भी प्रकार के अमेरिकी सरकारी संसाधन या वित्तीय सहायता के हस्तांतरण पर रोक लगा दी है। इस फैसले से WHO के कई कार्यक्रमों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

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