बांग्लादेश में चुनाव का माहौल गर्म है, लेकिन महिलाओं के लिए ये मैदान बिल्कुल ठंडा पड़ गया है. बांग्लादेश के आने वाले चुनाव में महिलाओं की हालत देखकर आप सब दंग रह जाएंगे. 51 में से 30 पार्टियों ने एक भी महिला को टिकट ही नहीं दिया है. जबकि कुल उम्मीदवारों में सिर्फ 4.24% महिलाएं है. सबसे शॉकिंग नाम हैं बड़े दलों के है. जिनमें जमात-ए-इस्लामी ने 276 उम्मीदवार उतारे हैं वह सभी पुरुष. इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने 268 नामांकन किए हैं, एक भी महिला नहीं है. बीएनपी जैसी दिग्गज पार्टी जो खुद महिला लीडरशिप वाली है उसने 328 में सिर्फ 10 महिलाओं को टिकट दिया है. कोई पार्टी 10 से ज्यादा महिलाओं को नहीं उतार रही है.

बांग्लादेश खिलाफत मजलिस (94), खिलाफत मजलिस (68), बांग्लादेश इस्लामी फ्रंट (27), लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (24), जोनोतार दल (23) और कई अन्य ने सिर्फ पुरुषों को मौका दिया है. यहां तक कि एक-एक उम्मीदवार वाली पार्टियां भी पुरुष ही उतार रही हैं. ये देखकर लगता है, महिलाओं के लिए राजनीति के दरवाजे बंद हैं.

मीडिया से बात करते हुए चुनाव सुधार आयोग की सदस्य जेस्मिन तुली ने कहा, “ये प्रक्रिया अभी भी पुरुषों के कब्जे में है. बड़ी पार्टियां कम देती हैं, छोटी कॉपी करती हैं.” वो बताती हैं कि पैसों की तंगी, समाज की पुरानी सोच और ताकत की कमी महिलाओं को रोकती है। “आंदोलन में महिलाएं आगे-आगे, लेकिन चुनाव आते ही साइड हो जाती हैं. पार्टियां मदद कर सकती थीं, लेकिन करती नहीं.” फेयर इलेक्शन मॉनिटरिंग अलायंस की अध्यक्ष मुनीरा खान ने हालात को “बेहद निराशाजनक” बताते हुए कहा कि महिलाएं अर्थव्यवस्था संभालती हैं, लेकिन राजनीति में जगह नहीं है. लोकतंत्र की बात करते हैं, लेकिन अंदर से खोखला.” विमेंस अफेयर्स रिफॉर्म कमीशन की प्रमुख शिरीन हक कहती हैं, “निराश हूं, लेकिन हैरान नहीं. ये पुरुष प्रधान कल्चर का नतीजा है.” वो 50-50 मॉडल सुझाती हैं.

चुनाव आयोग के ताजा आंकड़े चौंका देने वाले हैं. 51 राजनीतिक पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन 30 पार्टियां ऐसी हैं जिन्होंने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. कुल 2,568 उम्मीदवारों में सिर्फ 109 महिलाएं हैं, यानी महज 4.24 प्रतिशत. इनमें भी ज्यादातर स्वतंत्र हैं, पार्टियों ने तो मुश्किल से 72 को मौका दिया. ये आंकड़े बताते हैं कि आबादी की आधी हिस्सा होने के बावजूद महिलाओं को राजनीति में जगह नहीं मिल रही. 21 पार्टियां महिलाओं को टिकट दे रही हैं, पर संख्या बेहद कम. जातीय पार्टी और बासद ने 9-9 महिलाएं उतारीं. जुलाई विद्रोह वाली एनसीपी ने 44 में 3. कानून कहता है पार्टियों में 33% महिलाओं का कोटा, लेकिन ज्यादातर फेल.

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