जगदलपुर। केके रेललाइन पर भूस्खलन ने रेल यातायात को प्रभावित किया है, लेकिन इसका खामियाजा अब किरंदुल-दंतेवाड़ा क्षेत्र के हजारों यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है। मल्लीगुड़ा स्टेशन के पास 25 सितंबर को हुए भूस्खलन के बाद विशाखापट्टनम से बस्तर आने वाली ट्रेनों का परिचालन कोरापुट तक सीमित कर दिया गया है। दूसरी ओर, किरंदुल से विशाखापट्टनम जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पिछले 20 दिनों से किरंदुल स्टेशन पर खड़ी है। यात्रियों का सवाल है कि जब दूसरी ट्रेनों को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत चलाया जा रहा है तो इस पैसेंजर को जयपुर या जगदलपुर तक क्यों नहीं चलाया जा सकता? रेल प्रबंधन से पिछले 15 दिनों से ट्रेन को नवरात्रि स्पेशल के रूप में चलाने की मांग की जा रही है, लेकिन मांग पर निर्णय नहीं होने से किरंदुल, बचेली, भांसी और दंतेवाड़ा के यात्रियों को बसों का सहारा लेना पड़ रहा है।
जिस रेल सफर के लिए किरंदुल से जगदलपुर तक करीब 35 रुपये और दंतेवाड़ा से 25 रुपये किराया लगता है, उसके लिए यात्रियों को क्रमशः 228 और 180 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। नवरात्रि में मां दंतेश्वरी के दर्शन के लिए पहुंचे पदयात्रियों पर भी अतिरिक्त किराये का बोझ पड़ रहा है। बस्तर सांसद महेश कश्यप ने बताया कि उन्होंने ईस्ट कोस्ट रेलवे के महाप्रबंधक से ट्रेन चलाने का आग्रह किया है। अब सवाल यह है कि भूस्खलन प्रभावित रेललाइन की समस्या के बीच यात्रियों को राहत देने के लिए वैकल्पिक रेल परिचालन कब शुरू होगा?
ग्रामसभा का फरमान, परंपरा की रक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस
जगदलपुर। नानगुर तहसील स्थित बड़े बोदल गांव में धर्मांतरण को लेकर विवाद अब ग्रामसभा के फैसले तक पहुंच गया है। 14 अक्टूबर को आयोजित बैठक के बाद ग्रामीणों ने गांव के अटल चौक पर सूचना बोर्ड लगाकर धार्मिक गतिविधियों के लिए ग्रामसभा की लिखित अनुमति अनिवार्य होने की बात कही है। ग्रामीणों का आरोप है कि चंगाई सभाओं और बीमारी ठीक करने के दावों के जरिए लोगों को प्रभावित किया जा रहा है। उनका कहना है कि धर्म परिवर्तन के बाद कुछ परिवार देवगुड़ी, माटी पूजा और शीतला पूजा जैसी पारंपरिक मान्यताओं से दूरी बना रहे हैं।
ग्रामसभा ने पेसा कानून और आदिवासी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का हवाला देते हुए यह कदम उठाया है। हालांकि, इस फैसले के साथ धार्मिक स्वतंत्रता और गांव में आने-जाने के संवैधानिक अधिकारों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म मानने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है, जबकि पेसा कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका को मान्यता देता है। लेकिन इन प्रावधानों के आधार पर किसी व्यक्ति के धार्मिक अधिकार या आवागमन पर किस सीमा तक रोक लगाई जा सकती है, यह कानूनी परीक्षण का विषय है। बस्तर के दूसरे इलाकों में भी धर्मांतरण और पारंपरिक रीति-रिवाजों को लेकर तनाव की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे में चुनौती यह है कि आदिवासी संस्कृति की रक्षा के साथ हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों का भी पालन सुनिश्चित किया जाए।

गोरगुंडा में धर्मांतरण विवाद, घर खाली कराने की कोशिश से बढ़ा तनाव
सुकमा। जिले के दोरनापाल क्षेत्र में धर्मांतरण को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। गोरगुंडा पंचायत के देवरपल्ली में एक परिवार के घर खाली कराने की घटना के करीब एक सप्ताह बाद अब गोरगुंडा गांव में भी तनाव की स्थिति बन गई। ग्रामीणों ने धर्मांतरित परिवारों को गांव से हटाने की मांग करते हुए उनके घर खाली कराने की कोशिश की। सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुंची और ग्रामीणों को कानून हाथ में नहीं लेने की हिदायत दी। इसके बाद शीतला मंडप परिसर में ग्रामीणों, प्रशासनिक अधिकारियों और संबंधित परिवारों के बीच बैठक कराई गई।
ग्रामीणों की मांग थी कि धर्मांतरित परिवार अपनी मूल आदिवासी संस्कृति में वापस लौटें। बैठक के दौरान कुछ पुरुष सदस्यों ने वापसी पर सहमति जताई, लेकिन परिवार की महिलाओं ने इससे इनकार कर दिया। इस मतभेद के कारण बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी और गांव में तनाव बना हुआ है। ग्रामीणों का दावा है कि दो घरों की सीमेंट की छतें निकालकर सुरक्षित रखी गई हैं, जबकि प्रशासन ने विवाद को शांत कराने का प्रयास किया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर जारी इस विवाद का समाधान कानून के दायरे में कैसे निकलेगा। धार्मिक स्वतंत्रता और आवास के अधिकारों की रक्षा करते हुए प्रशासन के सामने गांव में शांति बनाए रखने की चुनौती है।
लालबाग में पहली बार मुरिया दरबार, बस्तर दशहरा को मिलेगा राष्ट्रीय मंच
जगदलपुर। बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपरा इस बार एक नए स्वरूप में दिखाई देने जा रही है। 23 अक्टूबर को पहली बार पारंपरिक सिरहासार भवन के बाहर लालबाग मैदान में मुरिया दरबार आयोजित करने की तैयारी है। इस ऐतिहासिक आयोजन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के शामिल होने की जानकारी दी गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति को बस्तर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया था, जिसे उन्होंने स्वीकार किया है। राष्ट्रपति का छत्तीसगढ़ प्रवास 22 और 23 अक्टूबर को प्रस्तावित है। मुरिया दरबार बस्तर की ऐसी परंपरा है, जिसमें जनजातीय समाज के प्रतिनिधि अपनी समस्याएं, मांगें और क्षेत्र से जुड़े मुद्दे सामने रखते हैं। अब तक सिरहासार भवन में होने वाला यह आयोजन पहली बार लालबाग मैदान में व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाएगा। इससे बस्तर की जनजातीय परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर सामने रखने का अवसर मिलेगा। राष्ट्रपति इससे पहले फरवरी 2026 में जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित बस्तर पंडुम में शामिल हुई थीं। उनके संभावित आगमन को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा, यातायात और आयोजन संबंधी तैयारियां तेज कर दी हैं। अब निगाहें 23 अक्टूबर पर हैं, जब मुरिया दरबार के मंच से बस्तर की परंपराओं के साथ स्थानीय समाज की अपेक्षाएं भी सामने आ सकती हैं।
रावघाट परियोजना पर लोगों की मांग, रोजगार से फसल मुआवजे तक सवाल
नारायणपुर/कांकेर। रावघाट खनन परियोजना क्षेत्र में विकास के साथ स्थानीय लोगों को मिलने वाले लाभ का मुद्दा एक बार फिर उठाया गया है। बूढ़ादेव अंजरेल माइंस श्रमिक विकास समिति ने बस्तर संभाग के कमिश्नर तथा नारायणपुर और उत्तर बस्तर कांकेर के कलेक्टरों को संयुक्त ज्ञापन सौंपा है। समिति ने लौह अयस्क परिवहन का भाड़ा 707 रुपये से बढ़ाकर 910 रुपये प्रति टन करने की मांग की है।नारायणपुर-अंतागढ़ मार्ग की खराब स्थिति से वाहनों को नुकसान और मालिकों पर बढ़ते खर्च का मुद्दा भी उठाया गया है। समिति का आरोप है कि परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के स्थानीय युवाओं को गैर-तकनीकी और अर्ध-तकनीकी पदों पर पर्याप्त रोजगार नहीं मिल रहा है।
खदानों से निकलने वाले दूषित लालपानी से खेतों और फसलों को नुकसान होने का आरोप लगाते हुए किसानों के संयुक्त सर्वे और मुआवजे की मांग की गई है। इसके अलावा 24 घंटे की ड्यूटी, नो-एंट्री व्यवस्था और फाइनेंस कंपनियों के एजेंटों की कथित प्रताड़ना पर भी चिंता जताई गई है।समिति ने स्कूलों में सुविधाएं बढ़ाने, अतिथि शिक्षकों का मानदेय बढ़ाने और बंद सोलर लाइटों तथा उप स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत की मांग रखी है।
बच्चों को लंबी दूरी तय करने से राहत देने के लिए स्कूल को नारायणपुर या भैसगांव के पास स्थानांतरित करने का प्रस्ताव भी दिया गया है। समिति का कहना है कि वह परियोजना के विरोध में नहीं, बल्कि प्रभावित ग्रामीणों, किसानों, श्रमिकों और युवाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठा रही है। अब देखना होगा कि प्रशासन इन मांगों पर क्या निर्णय लेता है और परियोजना प्रभावित लोगों को कब तक राहत मिलती है।
बस किराया बढ़ने से यात्रियों की जेब पर बोझ
जगदलपुर। बस्तर संभाग में बस से सफर करना अब आम यात्रियों के लिए पहले से ज्यादा महंगा पड़ने लगा है। परिवहन विभाग की नई किराया दरों के बाद सामान्य, डीलक्स और एसी बसों में यात्रा का खर्च बढ़ने की जानकारी सामने आई है। नई दरों के अनुसार सामान्य बस में शुरुआती पांच किलोमीटर के लिए 10 रुपये और उसके बाद प्रति किलोमीटर 1 रुपये 75 पैसे का किराया निर्धारित बताया गया है। डीलक्स बसों में शुरुआती पांच किलोमीटर के लिए 12 रुपये और उसके बाद प्रति किलोमीटर 2 रुपये 20 पैसे की दर बताई गई है। वहीं एसी स्लीपर और सेमी-स्लीपर बसों के लिए प्रति किलोमीटर 3 रुपये 20 पैसे की दर का उल्लेख किया गया है। इस बढ़ोतरी के बीच यात्रियों ने निर्धारित किराये से अधिक वसूली की शिकायत भी की है।
उदाहरण के तौर पर जगदलपुर से दंतेवाड़ा का निर्धारित किराया 160 रुपये बताया गया है, जबकि कुछ बसों में 180 रुपये वसूले जाने का आरोप है। दूसरी ओर, बस संचालकों का कहना है कि डीजल, टायर, ऑयल, टोल टैक्स और अन्य परिचालन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। संचालकों के मुताबिक, जगदलपुर-रायपुर मार्ग पर एक बस के आने-जाने का टोल खर्च करीब 3,000 रुपये तक पहुंच रहा है। उनका तर्क है कि सरकार टैक्स में राहत दे तो यात्रियों पर बढ़ते किराये का बोझ कम किया जा सकता है। अब जरूरत है कि परिवहन विभाग नई किराया दरों को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करे और निर्धारित दर से अधिक वसूली की शिकायतों पर कार्रवाई सुनिश्चित करे।
सीआरपीएफ जवान की मौत के बाद फिर उठा मानसिक स्वास्थ्य का सवाल
सुकमा। बस्तर में नक्सल मोर्चे पर तैनात सुरक्षा बलों के जवानों की मानसिक सेहत और कल्याण व्यवस्था को लेकर एक बार फिर चिंता सामने आई है। 13 अक्टूबर की मध्यरात्रि मेट्टागुड़म कैंप में 131वीं वाहिनी सीआरपीएफ के उपनिरीक्षक देवानंद यादव ने अपने सर्विस हथियार से खुद को गोली मार ली। साथी जवान उन्हें फील्ड एंबुलेंस से इल्मागुड़ा कैंप ले गए, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन फिलहाल इस कदम के पीछे की वजह स्पष्ट नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिसंबर 2025 में संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023 से 2025 के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, असम राइफल्स और एनएसजी में आत्महत्या के 438 मामले दर्ज हुए थे। इनमें सीआरपीएफ के 159 मामले शामिल थे। ये आंकड़े देशभर के हैं, केवल बस्तर के नहीं। सरकार के अनुसार, जवानों के तनाव को कम करने के लिए काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएं, योग और ध्यान जैसी गतिविधियां संचालित की जाती हैं।
हालांकि, इस घटना के कारणों को इन सामान्य परिस्थितियों से जोड़ना उचित नहीं होगा; इसकी वास्तविक वजह जांच के बाद ही सामने आएगी। परिवार से दूरी, कठिन तैनाती और निजी परेशानियां कुछ जवानों के लिए चुनौती हो सकती हैं, इसलिए समय पर सहायता तक पहुंच सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। बस्तर में जवानों की आत्महत्या से जुड़े अलग और नियमितआधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हों, तो स्थिति का बेहतर आकलन किया जा सकता है। यह घटना सुरक्षा बलों के लिए उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सहायता की पहुंच और प्रभाव की समीक्षा करने की जरूरत को फिर सामने लाती है। संपादकीय नोट: प्रसारण से पहले रेल किराये, बस किराये की अधिसूचना, राष्ट्रपति के कार्यक्रम और रावघाट परियोजना संबंधी मांगों की आधिकारिक पुष्टि कर लें। धर्मांतरण से जुड़े दोनों समाचारों में एक ही गोरगुंडा प्रकरण के दोहराव को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग संपादकीय कोण रखे गए हैं, ताकि प्रसारण में अनावश्यक पुनरावृत्ति न हो।
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