Automobile Desk – BS6 vs Pollution : दिल्ली-एनसीआर में ठंड की दस्तक के साथ ही हवा की गुणवत्ता बिगड़ने लगती है। प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन ने 1 नवंबर से एक बड़ा कदम उठाया है। अब बाहरी राज्यों से आने वाली केवल उन्हीं गाड़ियों को दिल्ली की सीमाओं में प्रवेश की अनुमति दी जा रही है जो बीएस-6 (BS6) मानकों को पूरा करती हैं। बीएस-4 या उससे पुरानी गाड़ियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। हालांकि सीएनजी, इलेक्ट्रिक वाहनों और दोपहिया गाड़ियों को इस प्रतिबंध से दूर रखा गया है। इस कड़े फैसले के बाद बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या बीएस-6 गाड़ियां हवा में बिल्कुल भी जहर नहीं घोलतीं और इनमें ऐसी कौन सी तकनीक लगी होती है जो धुएं का असर कम कर देती है।

तकनीकी रूप से देखा जाए तो बीएस-6 गाड़ियां भी धुआं और हानिकारक गैसें छोड़ती हैं, लेकिन पुरानी गाड़ियों की तुलना में उनसे होने वाला उत्सर्जन बेहद कम होता है। इन वाहनों का धुआं हवा में गायब नहीं होता, बल्कि साइलेंसर से बाहर निकलने से पहले ही उसे साइंटिफिक प्रोसेस से साफ कर दिया जाता है। इस काम के लिए ऑटोमोबाइल कंपनियों ने इंजन और एग्जॉस्ट सिस्टम में कई आधुनिक फिल्टर और एडवांस डिवाइस लगाए हैं, जो जहरीले तत्वों को काफी हद तक बेअसर कर देते हैं।

विशेषकर डीजल से चलने वाले बीएस-6 वाहनों में ‘डीजल पार्टिकुलेट फिल्टर’ यानी डीपीएफ बेहद अहम भूमिका निभाता है। जब इंजन से धुआं निकलता है, तो उसमें कार्बन के बारीक कण और कालिख मौजूद होती है। डीपीएफ इस पूरी कालिख को अपने अंदर रोक लेता है। जब फिल्टर में यह कचरा जमा हो जाता है, तो सिस्टम गाड़ी के चलते समय ही बहुत ऊंचे तापमान पर इसे जलाकर खत्म कर देता है। इस पूरी प्रक्रिया को ऑटोमोबाइल भाषा में रिजनरेशन कहा जाता है। इसके अलावा कई गाड़ियों में ‘सिलेक्टिव कैटेलिटिक रिडक्शन’ (SCR) तकनीक का प्रयोग होता है, जिसके लिए गाड़ी में अलग से ‘अडब्लू’ (AdBlue) नाम का लिक्विड डालना पड़ता है। यह केमिकल धुएं में मौजूद खतरनाक नाइट्रोजन ऑक्साइड को सामान्य नाइट्रोजन और पानी की भाप में बदल देता है।

पेट्रोल गाड़ियों की बात करें तो इनमें कैटेलिटिक कन्वर्टर का इस्तेमाल किया जाता है। यह डिवाइस एग्जॉस्ट से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसी गैसों को रासायनिक क्रिया के जरिए कम नुकसानदेह गैसों में बदलकर बाहर निकालता है। इसके साथ ही नए वाहनों में ‘ऑन-बोर्ड डायग्नोस्टिक्स’ (OBD) सिस्टम अनिवार्य किया गया है। यह गाड़ी के सेंसर पर लगातार नजर रखता है। अगर प्रदूषण नियंत्रण करने वाला कोई भी हिस्सा सही से काम नहीं करता, तो डैशबोर्ड पर वार्निंग लाइट जल जाती है, जिससे ड्राइवर को तुरंत खराबी का पता चल जाता है।

यह समझना जरूरी है कि बीएस-6 मानक का मकसद प्रदूषण को शून्य करना नहीं, बल्कि उसे एक सुरक्षित और तय सीमा के भीतर लाना है। अगर गाड़ी की सही समय पर सर्विस न कराई जाए या उसका डीपीएफ फिल्टर खराब हो जाए, तो बीएस-6 वाहन भी वायु गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। राजधानी में सर्दियों के मौसम में हवा की रफ्तार धीमी पड़ जाती है, जिससे गाड़ियों से निकलने वाला धुआं धरातल के पास ही जमा होकर स्मॉग बन जाता है। अध्ययनों के अनुसार, घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में गाड़ियों से निकलने वाले कण 40 प्रतिशत तक प्रदूषण फैलाते हैं। इसी वजह से दिल्ली सरकार ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू करते हुए ज्यादा धुआं देने वाले पुराने वाहनों पर कड़ा रुख अपनाया है।

भारत में वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए 1990 के दशक में पहली बार नियम बनाए गए थे। समय के साथ हवा को साफ रखने के लिए पेट्रोल में सीसा (Lead) हटाना और गाड़ियों में कैटेलिटिक कन्वर्टर लगाना जरूरी किया गया। केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2020 से पूरे देश में बीएस-4 के बाद सीधे बीएस-6 मानकों को अनिवार्य कर दिया था। इसके बाद से देश में केवल बीएस-6 गाड़ियों का ही निर्माण और पंजीकरण हो रहा है।