दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने बुजुर्ग गृहिणियों के परिवार में योगदान को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उम्र बढ़ने के साथ भले ही किसी बुजुर्ग महिला का परिवार की आर्थिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष योगदान न हो, लेकिन परिवार के लिए एक मार्गदर्शक और भावनात्मक सहारे के रूप में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। हाईकोर्ट ने बुजुर्ग गृहिणियों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि परिवार में उनकी उपयोगिता को केवल आर्थिक सहयोग के आधार पर नहीं आंका जा सकता। जीवन के अनुभव, मार्गदर्शन और भावनात्मक संबल के जरिए वे परिवार के सदस्यों को सहारा देती हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना में दिव्यांग हुई 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला की मुआवजा राशि बढ़ाते हुए घरेलू कामकाज और परिवार में बुजुर्ग महिलाओं के योगदान को लेकर अहम टिप्पणी की है। जस्टिस अनीश दयाल की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति के योगदान का आकलन इस रूढ़िवादी सोच के आधार पर नहीं किया जा सकता कि उम्र बढ़ने के साथ वह घर के लिए उपयोगी नहीं रह जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू कामकाज के लिए कोई वेतन नहीं मिलने का मतलब यह नहीं है कि दुर्घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को इसका लाभ दिया जाए या पीड़िता को मिलने वाले मुआवजे में कटौती की जाए।
उम्र के आधार पर बुजुर्ग महिला को निर्भर मानना गलत
हाईकोर्ट ने बुजुर्ग गृहिणी को केवल उसकी उम्र के आधार पर परिवार का आश्रित सदस्य मानने की धारणा को खारिज किया। पीठ ने कहा कि उम्र बढ़ने के बावजूद बुजुर्ग महिलाएं परिवार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे घर के कामकाज में योगदान देने के साथ-साथ पोते-पोतियों और परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल भी करती हैं। अदालत ने रेखांकित किया कि इस तरह के योगदान को अक्सर इसलिए पहचान नहीं मिलती, क्योंकि इससे कोई प्रत्यक्ष आमदनी नहीं होती। हालांकि, आर्थिक आय न होने से घरेलू कामकाज और देखभाल के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता।
घरेलू काम का आर्थिक मूल्य भी महत्वपूर्ण
अदालत की टिप्पणी का मुख्य आधार यह था कि मुआवजा तय करते समय किसी व्यक्ति के घरेलू और पारिवारिक योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई बुजुर्ग महिला परिवार की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियां निभाती है, तो उसकी भूमिका को केवल उम्र या कमाई के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 6.37 लाख रुपये बढ़ाया मुआवजा
मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) ने गंगा देवी को पहले 14.42 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसमें 6.37 लाख रुपये की बढ़ोतरी करते हुए कुल मुआवजा 20.79 लाख रुपये कर दिया है। इस राशि पर याचिका दायर करने की तारीख से 7.5 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देय होगा। ट्रिब्यूनल ने पहले यह कहते हुए भविष्य की आय के नुकसान के लिए मुआवजा देने से इनकार कर दिया था कि गंगा देवी कभी कामकाजी नहीं रही थीं। हाईकोर्ट ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि बिना वेतन के किए जाने वाले घरेलू कामकाज और पोते-पोतियों की देखभाल जैसी सेवाओं का भी आर्थिक मूल्य होता है। अदालत ने दुर्घटना के समय दिल्ली में कुशल श्रमिकों के लिए लागू न्यूनतम वेतन के आधार पर गंगा देवी की काल्पनिक मासिक आय 16,962 रुपये मानी। इसी आधार पर मुआवजे की गणना की गई। यह फैसला घरेलू कामकाज करने वाली महिलाओं के योगदान को आर्थिक दृष्टि से महत्व देने के लिहाज से अहम है।
क्या है पूरा मामला?
गंगा देवी वर्ष 2019 में दिल्ली के पांडव नगर इलाके में बस दुर्घटना का शिकार हो गई थीं। इस हादसे में उनके दोनों पैर कुचल गए थे। गंभीर चोटों के कारण उनका बायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा, जबकि दाएं पैर की सभी उंगलियां भी चली गईं। इस दुर्घटना के बाद गंगा देवी को 74 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का सामना करना पड़ा। मुआवजे के मामले में हाईकोर्ट ने उनकी शारीरिक क्षति के साथ-साथ घरेलू कामकाज और परिवार की देखभाल में उनके योगदान को भी महत्व दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को केवल इसलिए कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वह घर के काम के बदले वेतन नहीं लेती थी। घरेलू जिम्मेदारियों और देखभाल के काम का भी आर्थिक महत्व है, जिसे मुआवजा तय करते समय नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
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