फ़ीचर स्टोरी । छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है, जो प्राकृतिक रूप से परिपूर्ण है. राज्य की संपदा का एक बड़ा हिस्सा जल आधारित है. राज्य में नदी-नालों की संख्या हजारों में हैं. अनेक छोटी-बड़ी नदियों वाले इस राज्य में अपार छोटे-बड़े नाले हैं. हालांकि इनमें से अधिकतर बरसाती है. बरसात के बाद कई नदियां और नाले सूख जाते हैं. इसके पीछे की एक बड़ी वज़ह रही है, जतन न हो अर्थात देख-रेख न होना. बतौर किसान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस पीड़ा, नदी-नालों की इस अवस्था-दशा को बखूबी समझते रहे हैं. क्योंकि मुख्यमंत्री गांव से आते हैं. गाँव में नदी और नालों की अहमियत क्या होती हैं, वे इसे जानते थे. वे यह भी जानते थे कि नदी-तालाब-नाले सभी से छत्तीसगढ़ियों का सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है. राज्य की चिन्हारी के तौर पर नदियों और नालों को जाना जाता है.


इसी चिन्हारी को बचाने के लिए भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री बनते ही एक योजना की शुरुआत की. योजना का नाम दिया- ‘नरवा-गरवा, घुरवा-बारी’ इस योजना के तहत आज प्रदेश में सरकार की ओर बारी को भी बचाने का काम हो रहा है, घुरवा को भी बचाने का काम हो रहा है, गरवा को बचाने का काम हो रहा है और नरवा को भी बचाने का काम हो रहा है. राज्य सरकार आज वनांचल में लगभग 4 सौ करोड़ से अधिक की राशि स्वीकृत कर 2 हज़ार नालों को संरक्षित, संवर्धित और पुनर्जीवित करने का काम कर रही है. इससे 8 लाख हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र में 38 लाख भू-जलसंरक्षण होगा.

नरवा जतन और चार चिन्हारी

इस फ़ीचर स्टोरी में बात ‘नरवा’ की करेंगे. बताएंगे कि किस तरह से सरकार छत्तीसगढ़ की चार चिन्हारी में से एक नरवा को बचाने के लिए काम कर रही है ? स्टोरी में बात वनांचल की है. वनों में जो नाले बहते हैं, आखिर उसका जतन कैसे किया जा रहा है ? सरकार की योजना से कैसे वनों जल संग्रहण, संरक्षण का काम हो रहा है ? सबकुछ इस रिपोर्ट में आपको बताएंगे.

नरवा-गरवा-घुरवा-बारी को सुराजी योजना के तहत संचालित किया जा रहा है. इस योजना का क्रियान्वयन कई विभागों की ओर से किया जा रहा है. जैसे की वन विभाग की ओर से नरवा जतन का कार्यक्रम चलाया है. वन विभाग की ओस संचालित नरवा विकास कार्यक्रम में कैंपा मदद की राशि का उपयोगन किया जा रहा है.

8 लाख से अधिक हेक्टेयर में जल संरक्षण

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक नरवा विकास कार्यक्रम अंतर्गत कैम्पा की वार्षिक कार्ययोजना 2021-22 में 392 करोड़ रूपए से अधिक की राशि स्वीकृत की गई है, इसमें 01 हजार 962 नालों के 8.17 लाख हेक्टेयर जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 38 लाख भू-जल संरक्षण संबंधी संरचनाओं का निर्माण प्रगति पर है.

आँकड़ों से यह बात स्पष्ट हो रहा कि सरकार किस तरह से भविष्य में संभावित जल संकट से उबरने की तैयारी कर रही है. वर्तमान में देखा जा सकता कि कई देशों में, देश के ही अंदर कई राज्यों में जल संकट गहराता ही जा रहा है. ऐसे में राज्य सरकार की ओर से नरवा विकास कार्यक्रम एक मील का पत्थर है. राज्य में भले ही पानी अपार हो, लेकिन अपार पानी को संरक्षित रखना भी भविष्य के लिए जरूरी है. जरूरी है कि बरसात के पानी को संग्रहित कर रखे.

कई नदी-नाले पुनर्जीवित
भूपेश सरकार ने इस पर गंभीरता से ज़ोर दिया है. नतीजा आज राज्य में कई नदी-नालों को पुनर्जीवित किया गया है. जंगल के क्षेत्रों में विशेष कार्ययोजना बनाकर काम किया जा रहा है.
वन विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक कैम्पा की वार्षिक कार्ययोजना 2021-22 के तहत प्रदेश के दो राष्ट्रीय उद्यान, दो टाईगर रिजर्व, 01 सामाजिक वानिकी तथा 01 एलीफेंट रिजर्व सहित 30 वन मंडलों के नालों में भू-जल संवर्धन संबंधी संरचनाएं निर्मित की जा रही है.
छत्तीसगढ़ राज्य प्रतिकरात्मक वनरोपण, निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) मद से बनने वाली इन जल संग्रहण संरचनाओं से वनांचल में रहने वाले लोगों और वन्य प्राणियों के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित होगी. साथ ही नाले में पानी का भराव रहने से आस-पास की भूमि में नमी बनी रहेगी। इससे खेती-किसानी में सुविधा के साथ-साथ आय के स्रोत और हरियाली में भी वृद्धि होगी.

नरवा जतन से हरा-भरा वन

वन क्षेत्रों में पानी का संग्रहण जिस पैमाने पर किया जा रहा है वह एक रिकॉर्ड है. बरसात के बाद भी जंगल के अंदर नाले में पानी रहे और वन्यप्राणियों को किसी तरह की कोई तकलीफ़ इसका पूरा ख़्याल रखा गया है. प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख राकेश चतुर्वेदी ज़िलेवार आँकड़ा देते हुए कहते हैं कि नरवा विकास योजना के तहत कैम्पा की वार्षिक कार्ययोजना 2021-22 के अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारणयों, वन परिक्षेत्रों काफ़ी काम किया गया है.

ज़िलावार आँकड़ा-
गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान सरगुजा के 50 नालों में 96 हजार 850 तथा कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान जगदलपुर के 7 नालों में 13 हजार 559 संरचनाओं का निर्माण किया किया जा रहा है। इसी तरह इन्द्रावती टायगर रिजर्व बीजापुर के 93 नालों में एक लाख 80 हजार 847 तथा अचानक मार्ग टायगर रिजर्व लोरमी के 52 नालों में एक लाख से अधिक संरचनाओं का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा एलीफेंट रिजर्व सरगुजा के 64 नालों में एक लाख 23 हजार 580 तथा अनुसंधान एवं विस्तार जगदलपुर के अंतर्गत 33 नालों में 63 हजार से अधिक संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है.


इसी तरह वन मंडलवार बिलासपुर के 50 नालों में 96 हजार 850, मरवाही के 128 नालों में 2 लाख 48 हजार 516, कोरबा के 83 नालों में एक लाख 59 हजार 802 तथा कटघोरा के 50 नालों में 96 हजार 850 संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है। रायगढ़ के 19 नालों में 36 हजार 415, धरमजयगढ़ के 86 नालों में एक लाख 65 हजार 613, जांजगीर-चांपा के 5 नालों में 9 हजार 685 तथा मुंगेली के 35 नालों में 68 हजार 614 संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है।


रायपुर के छह नालों में 12 हजार, बलौदाबाजार के 97 नालों में एक लाख 87 हजार 970, धमतरी के 10 नालों में 19 हजार 757, सुकमा के 65 नालों में एक लाख 24 हजार 936, बीजापुर के 28 नालों में 53 हजार 752 तथा दंतेवाड़ा के 5 नालों में 10 हजार 575 संरचनाओं का निर्माण हो रहा है। जशपुर के 50 नालों में 96 हजार 850, सरगुजा के 49 नालों में 94 हजार 913, सूरजपुर के 35 नालों में 68 हजार 279, बलरामपुर के 136 नालों में 2 लाख 64 हजार 987 संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है। कोरिया के 123 नालों में 2 लाख 37 हजार 669, मनेन्द्रगढ़ के 85 नालों में एक लाख 63 हजार 676, कांकेर के 74 नालों में एक लाख 43 हजार 904 तथा पूर्व भानुप्रतापपुर के 25 नालों में 48 हजार 426 संरचनाओं का निर्माण हो रहा है। वन मंडलवार केशकाल के 33 नालों में 64 हजार 260, पश्चिम भानुप्रतापपुर के 43 नालों में 82 हजार 710, दक्षिण कोण्डागांव के 75 नालों में एक लाख 44 हजार 451 तथा नारायणपुर के 60 नालों में एक लाख 16 हजार 220 संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है.

बदला है आज, सुनहरा है कल

ज़िलेवार आँकड़ों से यह समझ आता है कि भूपेश सरकार में चलाई जा रही है योजनाओं से वर्तमान बदल गया और भविष्य में एक सुनहरा कल है. पानी को बचाने, पानी को सहेजने का यह कार्यक्रम पहले की तरह ही सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब धरातल पर योजनाएं क्रियान्वयित हो रही, आकार भी ले रही है और साकार भी हो रही है. फलीभूत होती योजनाओं से जहाँ जनविश्वास बढ़ता ही वहीं सरकार को बेतर कार्य करते रहने का बल भी मिलता है.

भूपेश सरकार ने यही वहज है कि अपने साढ़े तीन साल के कार्यकाल में तमाम योजनाओं को सिर्फ़ योजनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे ज़मीन पर उताकर आम लोगों तक पहुँचाया. तभी लोग अब कहते हैं कि कका ज़िंदा हे, भूपेश है तो भरोसा.