छत्तीसगढ़ः साल में एक बार खुलता है ‘लिंगई माता मंदिर’… कोरोनाकाल में 2 साल बाद इसदिन खुलेगा मंदिर… संतान प्राप्ति के लिए आते है भक्त

फरसगांव ब्लॉक से लगभग 8 किमी दूर पश्चिम से बड़ेडोंगर मार्ग पर ग्राम आलोर स्थित है. ग्राम से लगभग 2 किमी दूर उत्तर पश्चिम में एक पहाड़ी है जिसे लिंगई गट्टा लिंगई माता (Lingai Mata Mandir) के नाम से जाना जाता है.

इस छोटी से पहाड़ी के ऊपर विस्तृत फैला हुई चट्टान के ऊपर एक विशाल पत्थर है. बाहर से अन्य पत्थर की तरह सामान्य दिखने वाला यह पत्थर स्तूप-नुमा है. इस पत्थर की संरचना को भीतर से देखने पर ऐसा लगता है कि मानो कोई विशाल पत्थर को कटोरानुमा तराश कर चट्टान के ऊपर उलट दिया गया है. लिंगई माता मंदिर के दक्षिण दिशा में एक सुरंग है जो इस गुफा का प्रवेश द्वार है. द्वार इनता छोटा है कि बैठकर या लेटकर ही यहां प्रवेश किया जा सकता है. गुफा के अंदर 25 से 30 आदमी बैठ सकते हैं. गुफा के अंदर चट्टान  के बीचों-बीच निकला शिवलिंग है, जिसकी ऊंचाई लगभग दो फुट होगी. श्रद्धालुओं का मानना है कि इसकी ऊंचाई पहले बहुत कम थी समय के साथ यह बढ़ गई.

जाने किस दिन खुलेगा मंदिर

परंपरा और लोक मान्यता के कारण इस प्राकृतिक मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना नहीं होती है. लेकिन मंदिर का पट वर्ष में एक बार खुलता है और इसी दिन यहां मेला भरता है. यह पट इस साल 15 सितंबर को खुलेगा. समिति ने बैठक में निर्णय लिया है कि कोरोना को देखते हुए इस बार पुजारी ही पूजा करेंगे. भक्तों को एंट्री नहीं मिलेगी. मंदिर के पुजारी ने कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण मंदिर का पट दो साल बाद खुलेगा.

इस मंदिर से जुड़ीं हैं दो मान्यताएं

लिंगई माता मंदिर के इस धाम से जुड़ी दो विशेष मान्यताएं प्रचलित हैं. पहली मान्यता संतान प्राप्ति के बारे में है. यहां आने वाले अधिकांश श्रद्धालु संतान प्राप्ति की मन्नत मांगने आते है. यहां मनौती मांगने का तरीका अनूठा है. संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति को खीरा चढ़ाना होता है. प्रसाद के रूप में चढ़े खीरे को पुजारी, पूजा के बाद दंपति को वापस लौटा देता है. इसके बाद दंपत्ति को शिवलिंग के सामने ही इस ककड़ी को अपने नाखून से चीरा लगाकर दो टुकड़ों में तोड़कर इस प्रसाद को दोनों को ग्रहण करना होता है. चढ़ाए हुए खीरे को नाखून से फाड़कर शिवलिंग के समक्ष ही (कड़वाभाग सहित) खाकर गुफा से बाहर निकलना होता है.

ये है दूसरी मान्यता

यहां प्रचलित दूसरी मान्यता भविष्य के अनुमान को लेकर है. एक दिन की पूजा के बाद मंदिर बंद कर दिया जाता है. बाहरी सतह पर रेत बिछा दी जाती है. अगले साल इस रेत पर जो चिन्ह मिलते हैं, उससे पुजारी भविष्य का अनुमान लगाते हैं. उदाहरण स्वरूप यदि कमल का निशान हो तो धन संपदा में बढ़ोत्तरी होती है, हाथी के पांव के निशान हो तो उन्नति, घोड़ों के खुर के निशान हों तो युद्ध, बाघ के पैर के निशान हो तो आतंक तथा मुर्गियों के पैर के निशान होने पर अकाल होने का संकेत माना जाता है.

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