Bihar News: बच्चों और किशोरों में नशे की बढ़ती समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट के CJI सूर्यकांत ने अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि कम उम्र में नशे की लत लगने का असर सिर्फ बच्चे की सेहत तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका बुरा असर उसकी पढ़ाई, परिवार और आगे की जिंदगी पर भी पड़ता है। इसलिए ऐसे बच्चों के साथ सिर्फ इलाज तक सीमित नजरिया रखने के बजाय उनके पुनर्वास और भविष्य पर भी ध्यान देना होगा।

सिर्फ नशा छुड़ाना काफी नहीं- CJI सूर्यकांत

दरअसल पटना के लोकभवन में कल शनिवार को पाटलिपुत्र प्रज्ञा प्रवाह की ओर से व्याख्यानमाला ‘ड्रग्स से परे बचपन : संरक्षण, देखभाल और पुनर्समावेशन’ आयोजित की गई थी। कार्यक्रम में CJI सूर्यकांत ने बाल संरक्षण से जुड़े कई पहलुओं पर विचारों को सामने रखा।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि नशे की गिरफ्त में आने की वजह से बच्चे शिक्षा से कट सकते हैं। इसके साथ ही परिवार से भी उनका जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि, समस्या यहीं खत्म नहीं होती है। नशे की गिरफ्त में आए बच्चे शोषण, हिंसा और तस्करी जैसे खतरों के प्रति भी ज्यादा असुरक्षित हो सकते हैं। ऐसे में बाल संरक्षण की व्यवस्था को सिर्फ नशा छुड़ाने तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। बच्चे की सुरक्षा और उसके भविष्य को ध्यान में रखते हुए आगे की व्यवस्था भी करनी होगी। बच्चों को नशे की गिरफ्त से बाहर निकालने के बाद उसके लिए ऐसा माहौल तैयार करना जरूरी है, जिससे वह दोबारा उस पुरानी स्थिति (नशे की गिरफ्त) में नहीं पहुंचे।

इलाज के बाद परिवार और समाज का साथ जरूरी

सीजेआई ने कहा कि, इलाज पूरा होने के बाद बच्चे को अकेला छोड़ देना सही तरीका नहीं है। उसे परिवार का सहयोग, स्कूल में लौटने का अवसर और समाज में दोबारा अपनी जगह बनाने के लिए जरूरी मदद मिलनी चाहिए। CJI सूर्यकांत ने बाल संरक्षण के दौरान बच्चे की गरिमा और आत्मसम्मान का ध्यान रखने की बात कही।

उन्होंने कहा कि, नशे की समस्या से जूझ रहे बच्चे को केवल मरीज या अपराध से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। उसके अधिकार और भविष्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। किसी बच्चे के इलाज के बाद उसकी पढ़ाई, मानसिक स्थिति और समाज में वापसी पर काम करना भी जरूरी है। तभी पुनर्वास को वास्तविक रूप से सफल माना जा सकेगा।

परिवार और स्कूल की भी भूमिका अहम

CJI सूर्यकांत ने कहा कि बच्चों को नशे से बचाने का काम अकेले सरकार या पुलिस-प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। परिवार, स्कूल और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। बच्चों को शुरुआत से ही नशे के खतरों के प्रति जागरूक करने और जरूरत पड़ने पर समय रहते मदद उपलब्ध कराने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। उन्होंने कहा कि किसी बच्चे में नशे की समस्या सामने आने पर उसे सामाजिक रूप से अलग करने या सिर्फ सजा की नजर से देखने के बजाय इलाज और संरक्षण की दिशा में ले जाना चाहिए।

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