कुमार इंदर, जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) में न्यायाधीशों (जजों) की नियुक्ति का मामला एक बार फिर कानूनी विवादों में घिर गया है। हाल ही में 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जज बनाने के लिए की गई 7 अधिवक्ताओं की सिफारिश को चुनौती देते हुए जबलपुर स्थित मुख्य पीठ में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की कमी और तय संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी करने का गंभीर आरोप लगाया गया है।

ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने दायर की याचिका

यह याचिका ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) में प्रस्तुत की गई है। कॉलेजियम की सिफारिश को चुनौती: याचिका में 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीश पद के लिए अनुशंसित 7 वकीलों (अधिवक्ताओं) के नामों पर आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता संगठन का तर्क है कि सिफारिशों में सामाजिक विविधता, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक मूल्यों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है, जिससे समाज के सभी वर्गों को न्यायपालिका में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।

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याचिका में ‘करिया मुंडा समिति’ का हवाला

याचिका में अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए ऐतिहासिक रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक न्यायिक निर्णयों के तथ्यों को शामिल किया गया है। याचिका में संसद की ‘करिया मुंडा समिति’ की उस रिपोर्ट के प्रमुख अंशों का उल्लेख किया गया है, जिसमें उच्च न्यायपालिका (हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट) की नियुक्तियों में पिछड़े, अनुसूचित जाति, जनजाति और वंचित वर्गों की भागीदारी व सामाजिक समावेशिता सुनिश्चित करने की बात कही गई थी।

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केशवानंद भारती मामला

इसके साथ ही याचिका में लैंडमार्क ‘केशवानंद भारती मामले’ के सिद्धांतों और मूल ढांचे के संवैधानिक मूल्यों का हवाला देते हुए न्यायपालिका में पारदर्शिता और विविधता को आवश्यक बताया गया है। उच्च न्यायालय में इस जनहित याचिका के दायर होने के बाद न्यायिक हलकों में नियुक्तियों की प्रक्रिया और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक नई कानूनी बहस छिड़ गई है। आगामी दिनों में हाईकोर्ट की पीठ इस याचिका पर सुनवाई कर सकती है।

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