जगतसिंहपुर। ओडिशा की राजनीति में एक नई विवादित स्थिति पैदा हो गई है। पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता स्वर्गीय दामोदर राउत की प्रतिमा को वन विभाग द्वारा हटाए जाने के बाद राज्य में सियासी घमासान तेज हो गया है। यह कार्रवाई जगतसिंहपुर जिले के शियाली समुद्र तट के पास की गई, जहां प्रतिमा का अनावरण होना अभी बाकी था।

जानकारी के मुताबिक, वन विभाग ने शुक्रवार रात (24 अप्रैल 2026) को शियाली बीच के पास स्थापित दामोदर राउत की अर्ध-प्रतिमा को हटाते हुए ढहा दिया। विभाग का कहना है कि यह प्रतिमा तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) के नियमों का उल्लंघन करते हुए वन भूमि पर बिना अनुमति के स्थापित की गई थी। खास बात यह है कि इस प्रतिमा का औपचारिक अनावरण 26 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित था और इसके लिए निमंत्रण पत्र भी वितरित किए जा चुके थे, लेकिन उससे दो दिन पहले ही प्रशासन ने कार्रवाई कर दी।

बीजेडी का तीखा विरोध, “प्रतिशोध की राजनीति” का आरोप

इस कार्रवाई पर बीजेडी ने कड़ा विरोध जताया है। दामोदर राउत के पुत्र और पार्टी नेता संबित राउत राय ने इसे “प्रतिशोध की राजनीति” और “अपमानजनक” करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन चाहें तो प्रतिमा को हटाने के बजाय किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने का सुझाव दे सकता था, लेकिन आधी रात में इस तरह की कार्रवाई करना उनके पिता के सम्मान के खिलाफ है।

बीजेडी नेताओं ने सरकार से इस मामले में स्पष्ट जवाब मांगा है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। पार्टी का कहना है कि दामोदर राउत, बीजू पटनायक के करीबी सहयोगी रहे हैं और उनके योगदान का इस तरह अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

भाजपा सांसद ने भी जताई आपत्ति

दिलचस्प रूप से इस मुद्दे पर राजनीतिक सीमाएं भी धुंधली पड़ती दिखीं। भाजपा सांसद विभु प्रसाद तराई ने भी इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि दामोदर राउत का पांच दशकों का राजनीतिक जीवन सम्मान का पात्र है और प्रशासन को ऐसी कार्रवाई से बचना चाहिए था।

स्थानीय विरोध की तैयारी, प्रशासन सतर्क

इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर भी विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। शियाली बालीयात्रा समिति और आसपास के निवासियों ने प्रदर्शन की चेतावनी दी है। संभावित विरोध को देखते हुए पुलिस प्रशासन क्षेत्र में सतर्क हो गया है। वहीं बीजेडी ने संकेत दिए हैं कि वह इस मुद्दे को सड़क से लेकर सदन तक उठाएगी।

कानूनी बनाम सियासी मुद्दा

फिलहाल यह मामला सिर्फ अवैध निर्माण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ओडिशा में राजनीतिक विरासत और सम्मान की लड़ाई का रूप ले चुका है। एक तरफ प्रशासन नियमों का हवाला दे रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रहा है।

अब देखना होगा कि सरकार इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है और क्या इस मामले में कोई समाधान निकल पाता है या नहीं।

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