दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने एक स्वीडिश महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी होना अपने आप में इस बात का निर्णायक सबूत नहीं है कि किसी व्यक्ति ने हिंदू धर्म अपना लिया है या वह हिंदू है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू मैरिज एक्ट (HMA) के तहत विवाह तभी वैध माना जाता है, जब वह दो हिंदुओं के बीच हिंदू कानून में निर्धारित आवश्यक रस्मों और परंपराओं के अनुसार हुआ हो।

स्वीडिश महिला ने गाइडलाइंस को दी थी चुनौती

मामला एक स्वीडिश महिला की याचिका से जुड़ा है। महिला ने दिल्ली राजस्व विभाग की उन गाइडलाइंस को चुनौती दी थी, जिनके तहत हिंदू मैरिज एक्ट के अंतर्गत विवाह पंजीकरण के लिए पति-पत्नी में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना और संबंधित मैरिज ऑफिसर के अधिकार क्षेत्र में स्थायी रूप से रहना जरूरी है। महिला ने मार्च में एक स्वीडिश व्यक्ति से आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी। उसका दावा था कि उसके पति ने पहले हिंदू धर्म अपना लिया था। इसके बाद उसने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत विवाह पंजीकरण के लिए ऑनलाइन आवेदन किया था।

केवल हिंदू रीति से विवाह पर्याप्त नहीं

कोर्ट ने कहा कि अगर धर्म परिवर्तन को साबित करने वाली स्वतंत्र सामग्री मौजूद नहीं है, तो केवल हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह होने से यह साबित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति HMA के अर्थ में हिंदू है। कोर्ट के मुताबिक, विवाह की रस्म और किसी व्यक्ति की धार्मिक स्थिति दो अलग-अलग पहलू हैं। कोर्ट ने याचिका में उठाई गई संवैधानिक चुनौती को स्वीकार नहीं किया। हालांकि, दिल्ली सरकार को विवाह पंजीकरण के ऑनलाइन पोर्टल में जरूरी तकनीकी बदलाव करने और विदेशी नागरिकों, OCI कार्डधारकों तथा PIO को आवेदन पूरा करने के लिए प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

स्वीडिश पुरुष से की थी शादी

महिला ने मार्च 2026 में एक स्वीडिश पुरुष से शादी की थी। उसका दावा था कि उसके पति ने शादी से पहले आर्य समाज मंदिर में हिंदू धर्म अपना लिया था और जरूरी हिंदू रीति-रिवाज एवं संस्कार पूरे किए थे। शादी के बाद मंदिर की ओर से मैरिज सर्टिफिकेट भी जारी किया गया था। महिला ने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत ऑनलाइन विवाह पंजीकरण कराने की कोशिश की। प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाने के बाद उसने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। उसने दिल्ली सरकार की उन गाइडलाइंस को भी चुनौती दी, जिनमें हिंदू मैरिज एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए पति-पत्नी में से कम से कम एक का भारतीय नागरिक होना जरूरी बताया गया है।

‘धर्म परिवर्तन का स्वतंत्र सबूत जरूरी’

चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि धर्म परिवर्तन की पुष्टि करने वाली स्वतंत्र सामग्री के अभाव में केवल हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी होने से यह स्थापित नहीं होता कि याचिकाकर्ता का पति हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 2 के अर्थ में हिंदू था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत विवाह तभी वैध होता है, जब वह दो हिंदुओं के बीच हिंदू कानून में निर्धारित आवश्यक रीति-रिवाजों और समारोहों के अनुसार संपन्न हुआ हो।

विदेशी नागरिकों के लिए पोर्टल में बदलाव का निर्देश

कोर्ट ने दिल्ली सरकार को ऑनलाइन विवाह पंजीकरण पोर्टल में तकनीकी बाधाएं दूर करने और विदेशी नागरिकों, OCI कार्डधारकों तथा PIO के लिए प्रभावी आवेदन व्यवस्था उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि जो आवेदक आधार आधारित प्रमाणीकरण नहीं कर सकते, उनके लिए पासपोर्ट या OCI कार्ड जैसे वैकल्पिक दस्तावेजों से पहचान सत्यापन की व्यवस्था होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा सिस्टम तैयार किया जाए, जिससे विदेशी नागरिक, ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्डधारक और भारतीय मूल के लोग लागू नियमों के तहत विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकें और प्रक्रिया पूरी कर सकें। चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि महिला की ओर से उठाई गई संवैधानिक चुनौती स्वीकार करने योग्य नहीं थी, क्योंकि इस मामले में उसके पास आवश्यक कानूनी अधिकार नहीं था। हालांकि, कोर्ट ने विवाह पंजीकरण पोर्टल से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों को दूर करने की जरूरत पर जोर दिया और दिल्ली सरकार को इस दिशा में आवश्यक बदलाव करने के निर्देश दिए।

आधार नहीं तो वैकल्पिक दस्तावेजों से पहचान

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पोर्टल में किए जाने वाले बदलाव ऐसे आवेदकों के लिए पहचान सत्यापन की सुविधा उपलब्ध कराने वाले होने चाहिए, जो आधार आधारित ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। इसमें विदेशी नागरिक और OCI कार्डधारक शामिल हैं। ऐसे आवेदकों को लागू कानूनी और प्रक्रियात्मक शर्तों के अनुसार वैध पासपोर्ट, OCI कार्ड या अन्य स्वीकार्य दस्तावेजों के जरिए अपनी पहचान सत्यापित करने की सुविधा दी जानी चाहिए।

हिंदू रीति से शादी पर भी कोर्ट की टिप्पणी

इससे पहले बेंच ने स्पष्ट किया था कि केवल हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी होने से यह साबित नहीं होता कि किसी व्यक्ति ने हिंदू धर्म अपना लिया है। धर्म परिवर्तन की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र सबूत नहीं होने पर हिंदू रस्मों के तहत हुआ विवाह किसी व्यक्ति के हिंदू होने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत विवाह तभी वैध माना जाता है, जब वह दो हिंदुओं के बीच कानून में निर्धारित आवश्यक रीति-रिवाजों और समारोहों के अनुसार संपन्न हुआ हो।

याचिकाकर्ता ने क्या तर्क दिया?

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हिंदू मैरिज एक्ट या संबंधित गाइडलाइंस में यह तय करने के लिए कोई विशेष मानक या प्रक्रिया नहीं बताई गई है कि कोई व्यक्ति हिंदू है या उसने हिंदू धर्म अपना लिया है। याचिकाकर्ता ने कहा कि जब इसके लिए कोई स्पष्ट कानूनी या नियामकीय मानक मौजूद नहीं है, तो पहले से रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी और पेश की गई दलीलों के अलावा अतिरिक्त सबूत मांगना मनमाना है।

दिल्ली सरकार ने किया विरोध

दिल्ली सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि विवाह किस तरह से संपन्न हुआ, इसे किसी विशेष कानून के लागू होने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। खास तौर पर तब, जब संबंधित पक्षों के धार्मिक दर्जे को साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र सबूत उपलब्ध न हो। सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि हिंदू मैरिज एक्ट का दायरा उन लोगों तक सीमित है, जो कानून के तहत हिंदू की श्रेणी में आते हैं। इसलिए केवल हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि विवाह में शामिल दोनों पक्ष हिंदू मैरिज एक्ट के तहत हिंदू हैं।

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