दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने बुधवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें लाल किले पर आजाद हिंद फौज (INA) के शहीदों के योगदान और बलिदान को समर्पित स्मारक बनाने की मांग की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि भारत की आजादी की लड़ाई में आजाद हिंद फौज के योगदान को सम्मान देने के लिए दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर एक अलग स्मारक स्थापित किया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किसी स्मारक का निर्माण करना और उसके लिए जमीन उपलब्ध कराना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट ने ऐसे नीतिगत निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने कहा कि लाल किले पर स्मारक बनाया जाए या नहीं, इसका फैसला केंद्र सरकार कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के नीतिगत निर्णय में न्यायालय दखल नहीं दे सकता। यह जनहित याचिका महान स्वतंत्रता सेनानी लालती राम ट्रस्ट की ओर से दायर की गई थी। ट्रस्ट ने अपनी याचिका में मांग की थी कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले आजाद हिंद फौज (INA) के सैनिकों को उचित पहचान और सम्मान देने के लिए लाल किले पर एक समर्पित स्मारक बनाया जाए। याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट से केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को स्मारक के निर्माण के लिए आवश्यक और शीघ्र कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

2021 के लोकसभा जवाब का दिया हवाला

ट्रस्ट की ओर से दलील दी गई कि केंद्र सरकार ने खुद 2 अगस्त 2021 को लोकसभा में दिए लिखित जवाब में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कई प्रस्तावों को मंजूरी दिए जाने की जानकारी दी थी। ट्रस्ट के मुताबिक, इन प्रस्तावों में लाल किले में INA शहीदों के लिए स्मारक बनाने का प्रस्ताव भी शामिल था। याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर अदालत से केंद्र सरकार को स्मारक निर्माण की दिशा में आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की थी।

‘मेमोरियल बनाना किसी जिम्मेदारी या अधिकार का मामला नहीं’

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि स्मारक का निर्माण किसी कानूनी अधिकार या सरकार की ऐसी जिम्मेदारी से जुड़ा मामला नहीं है, जिसके लिए अदालत आदेश जारी कर सके। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि जब स्मारक बनाना किसी अधिकार या जिम्मेदारी से जुड़ा विषय नहीं है, तो अदालत ऐसा निर्देश कैसे जारी कर सकती है। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि किसी खास व्यक्ति या समूह के सम्मान में स्मारक बनाया जाना चाहिए या नहीं, यह सामान्य तौर पर ऐसा विषय नहीं है, जिस पर रिट याचिका के जरिए न्यायिक फैसला दिया जा सके।

आर्टिकल 21 के आधार पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल

पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से संविधान के अनुच्छेद 21 और गरिमा के सिद्धांत पर किए गए भरोसे पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि रिट जारी करने के लिए याचिकाकर्ता को कोई स्पष्ट संवैधानिक आधार या मौलिक अधिकार के उल्लंघन को स्थापित करना होगा। याचिका का निपटारा करते हुए पीठ ने कहा कि PIB की प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से की गई घोषणाएं अपने आप में किसी कानूनी अधिकार की मांग का आधार नहीं बन सकतीं। अदालत ने इस आधार पर भी स्मारक बनाने का निर्देश देने से इनकार किया। हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ता को संबंधित केंद्रीय मंत्रालय से संपर्क करने और सभी दस्तावेजों के साथ एक विस्तृत प्रतिवेदन देने की स्वतंत्रता दी है। यानी ट्रस्ट अपनी मांग को लेकर केंद्र सरकार के समक्ष औपचारिक रूप से अपना पक्ष रख सकता है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जनहित याचिका का निपटारा करते समय अदालत की ओर से की गई टिप्पणियों को याचिकाकर्ता द्वारा किए गए दावों के मेरिट पर अदालत की राय नहीं माना जाना चाहिए।

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