संजय पाटीदार, भोपाल। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह इस समय अपनी नई पदयात्रा को लेकर सुर्खियों में छाए हुए हैं। विजयादशमी (दशहरा) के पावन अवसर पर उज्जैन में महाकाल की भूमि से उन्होंने पूरे जोर-शोर के साथ अपनी पदयात्रा का आगाज कर दिया है। इस यात्रा को ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा’ नाम दिया गया है, जिसमें उनकी पत्नी अमृता सिंह के अलावा बड़ी संख्या में समर्थक भी कदमताल करते नजर आ रहे हैं।
क्या है यात्रा का पूरा स्वरूप
यह पदयात्रा लगभग 900 किलोमीटर लंबी है, जिसके तहत दिग्विजय सिंह प्रतिदिन औसतन 15 किलोमीटर का सफर तय करेंगे। इस यात्रा का आधा सफर मध्य प्रदेश में और बाकी आधा सफर उत्तर प्रदेश में तय होगा। यात्रा के दौरान तिरंगे के साथ-साथ पांच रंगों की विशेष ध्वजा भी साथ चल रही है।
दिग्विजय सिंह भले ही अपनी इस यात्रा को ‘गैर-राजनीतिक’ बता रहे हैं और इसे जनता के सामने अपनी बात रखने का माध्यम कह रहे हैं, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थों से इंकार नहीं किया जा सकता। यात्रा की शुरुआत से ही वे सत्ता पक्ष पर हमलावर हैं। उन्होंने राम मंदिर निर्माण में चंदे की गड़बड़ी और वोट चोरी जैसे गंभीर मुद्दे उठाए हैं। खुद को सबसे बड़ा सनातनी बताते हुए उनका कहना है कि उन्होंने भी मंदिर के लिए चंदा दिया था, इसलिए उसका हिसाब दिया जाना चाहिए।
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दूसरी ओर, सत्ता पक्ष ने इस यात्रा को कड़ा आड़े हाथों लेते हुए इसे दिग्विजय सिंह की ‘नौटंकी’ करार दिया है। बीजेपी नेताओं का सवाल है कि जो लोग पहले राम मंदिर का विरोध करते थे, वे अब चंदे को लेकर इतना उत्साह क्यों दिखा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस यात्रा को आगामी उत्तर प्रदेश के चुनावों को ध्यान में रखकर विपक्ष का माहौल तैयार करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
नर्मदा परिक्रमा की तर्ज पर सियासी संदेश
राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले दिग्विजय सिंह के हर कदम के पीछे एक गहरा सियासी संदेश होता है। यह उनकी पहली पदयात्रा नहीं है; इससे पहले उन्होंने 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले नर्मदा परिक्रमा की थी, जिसके बाद लंबे समय बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार (कमलनाथ के नेतृत्व में) बनी थी। हालांकि, वह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी, जिसके लिए अक्सर दिग्विजय सिंह को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। अब एक बार फिर दिग्विजय सिंह की यह लंबी पदयात्रा कितना असर दिखाती है और उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसका कितना लाभ विपक्ष को मिलता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
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