चंडीगढ़ : पंजाब के लुधियाना से दिल दहला देने वाले दिलरोज कौर हत्याकांड में एक नया और बड़ा कानूनी मोड़ आया है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने ढाई साल की मासूम बच्ची को बेहद क्रूरता के साथ जिंदा दफनाने वाली दोषी महिला नीलम की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दोषी को 30 साल तक बिना किसी छूट या पैरोल के जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।
मामूली खिलौनों की वो खौफनाक ‘जलन’
यह पूरी घटना महज आपसी अनबन या किसी बड़े विवाद का नतीजा नहीं थी, बल्कि इसके पीछे छिपी थी एक मां की आत्मग्लानि और दूसरे के बच्चों के प्रति गहरी हीन भावना।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, लुधियाना के शिमलापुरी इलाके में रहने वाले पुलिस हेड कांस्टेबल हरप्रीत सिंह अक्सर अपनी ढाई साल की बेटी दिलरोज के लिए अच्छे कपड़े, महंगे खिलौने और सुंदर उपहार लाया करते थे। उनके पड़ोस में रहने वाली तलाकशुदा महिला नीलम के दो बेटे थे। हरप्रीत के बच्चों के पास नए और अच्छे खिलौने देखकर नीलम के बच्चे भी अक्सर रोते थे और वैसे ही खिलौनों की मांग करते थे। नीलम आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों की यह इच्छाएं पूरी नहीं कर पाती थी। इसी हीन भावना और बच्चों के खिलौनों को लेकर पैदा हुई ‘जलन’ ने नीलम के भीतर ऐसी रंजिश पैदा की कि उसने पड़ोसी की मासूम बच्ची को ही खत्म करने की खौफनाक साजिश रच डाली।
ऐसे दिया वारदात को अंजाम, फिर तलाश का नाटक
सुनसान जगह पर खोदा गड्ढा:
वारदात से पहले ही नीलम ने इलाके के पास एक सुनसान खाली प्लॉट में पहले से ही एक गहरा गड्ढा खोद रखा था।
स्कूटी पर अपहरण:
28 नवंबर 2021 को जब मासूम दिलरोज घर के बाहर खेल रही थी, तब नीलम उसे बहला-फुसलाकर अपनी एक्टिवा स्कूटी पर आगे बैठाकर ले गई।
जिंदा दफनाया:
सुनसान जगह पर ले जाकर नीलम ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने बच्ची के मुंह में जबरन मिट्टी ठूंस दी और उसे गड्ढे में जिंदा दफन कर दिया, जिससे दम घुटने से तड़प-तड़पकर मासूम की जान चली गई।
सीसीटीवी से खुला राज:
वारदात के बाद नीलम वापस आई और परिवार के साथ मिलकर खुद अनजान बनकर बच्ची को ढूंढने का ढोंग करने लगी। लेकिन पुलिस ने जब इलाके के सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगाले, तो नीलम बच्ची को स्कूटी पर ले जाती हुई साफ नजर आ गई। कड़ाई से पूछताछ में उसने अपना गुनाह कुबूल कर लिया।
कोर्ट रूम का वो मंजर जब कातिल रोने लगी
अप्रैल 2024 में लुधियाना की सेशन कोर्ट ने इस जघन्य अपराध को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामला मानते हुए नीलम को फांसी की सजा सुनाई थी। फैसला सुनते ही नीलम कोर्ट में जज के सामने फूट-फूटकर रोने लगी थी और अपने दो बच्चों का वास्ता देकर रहम की भीख मांग रही थी। हालांकि, तब निचली अदालत ने कोई नरमी नहीं दिखाई थी।
हाई कोर्ट ने क्यों बदली सजा?
सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने दोषी महिला की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा लेकिन उसकी फांसी की सजा को 30 साल की कठोर जेल में तब्दील कर दिया। माननीय हाई कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि सजा ऐसी होनी चाहिए जो आत्मनिरीक्षण, पश्चाताप और सुधार की गुंजाइश छोड़े। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दोषी महिला के अपने दो छोटे बच्चे हैं और उन्हें उनकी मां से पूरी तरह इस तरह अलग नहीं किया जाना चाहिए जहां से वापसी का कोई रास्ता न बचे। अदालत ने कड़े शब्दों में आदेश दिया कि यह 30 साल की सजा बिना किसी छूट (Remission) के पूरी करनी होगी।
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