पंचकूला: पूर्व डीएसपी भगवान दास की आत्महत्या के करीब 9 साल पुराने मामले में पंचकूला कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी 13 आरोपियों को बरी कर दिया। पंचकूला के एडिशनल सेशन जज विक्रमजीत अरोड़ा की अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करवाने या गिरफ्तारी की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन करना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसावा (IPC की धारा 306) नहीं माना जा सकता।

मामला 14 मार्च 2017 का है। हिसार के तत्कालीन डीएसपी भगवान दास पंचकूला सेक्टर-26 स्थित पुलिस लाइन के जिओ मेस पहुंचे थे। अगले दिन 15 मार्च 2017 की सुबह उन्होंने अपने कमरे में अपनी ही सर्विस रिवॉल्वर से सिर में गोली मार ली थी। गंभीर हालत में उन्हें सेक्टर-21 के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 27 मार्च 2017 को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

आत्महत्या नोट में लगाए थे गंभीर आरोप

भगवान दास ने आत्महत्या नोट में आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ झूठा हत्या का मुकदमा दर्ज कराया गया और गांव में विरोध प्रदर्शन व चक्का जाम कर उन्हें सामाजिक रूप से बदनाम किया जा रहा था। उन्होंने कुछ लोगों को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था।

पुलिस ने इस मामले में कुल 15 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। मामले की लंबी सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी बलवीर सिंह और रामेश्वर की मौत हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई समाप्त कर दी गई। अब अदालत ने बाकी 13 आरोपियों को भी बरी कर दिया।

कोर्ट ने क्या कहा?

बचाव पक्ष के वकील अमित दुबे ने अदालत में दलील दी कि डीएसपी और आरोपियों के बीच घटना वाले दिन या उससे पहले कोई सीधी बातचीत, धमकी या मुलाकात नहीं हुई थी।

अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 107 (उकसावा) का हवाला देते हुए कहा कि किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए उसके प्रत्यक्ष इरादे और उकसावे का सीधा संबंध आत्महत्या से साबित होना जरूरी है।

कोर्ट के मुताबिक, केवल मुकदमे के डर या सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने से परेशान होकर उठाया गया कदम कानूनी तौर पर आरोपियों द्वारा दिया गया ‘उकसावा’ नहीं माना जा सकता।

9 साल बाद खत्म हुआ मामला

करीब नौ साल तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 13 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट के इस फैसले से पूर्व डीएसपी भगवान दास आत्महत्या मामले में आरोपियों के खिलाफ चली लंबी कानूनी कार्रवाई अब समाप्त हो गई है।