देहरादून. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक पोस्ट के जरिए पिथौरागढ़ के इतिहास, प्राकृतिक सौंदर्य, सीमांत गांवों और सांस्कृतिक विरासत का विस्तार से जिक्र किया. सोर घाटी की उत्पत्ति से लेकर मुनस्यारी, ओम पर्वत, मिलम ग्लेशियर और पारंपरिक मेलों तक, उन्होंने इस जनपद की विविध पहचान सामने रखी. उन्होंने लिखा कि सोर घाटी का हृदय स्थल पिथौरागढ़ पहले कत्यूरी साम्राज्य का हिस्सा रहा है. सोर का शाब्दिक अर्थ है झील. एक बृहत कटोरे के आकार में बसा पिथौरागढ़ एक पुरानी झील जो समय के साथ सुख गई, उसी में बसा है आज का पिथौरागढ़, विण आदि भू-भाग.
रावत ने आगे लिखा कि रई झील शायद उसी का छोटा सा हिस्सा अवशेष है. चौदहवीं शताब्दी में यह भूभाग चंद राजाओं के साम्राज्य का हिस्सा बना. चंद राजा भारती चंद व लक्ष्मी चंद चर्चित शासक रहे. उसी राजवंश के राजा पिथौरा साही के नाम पर इसका नाम पिथौरागढ़ पड़ा. ब्रिटिश शासन में आने से पहले इस भूभाग पर गोरखाओं का कब्जा था और उन्होंने ही पिथौरागढ़ के किले का निर्माण किया, जिसका जीर्णोद्धार हमारी सरकार ने कराया और आज वहां एक शानदार सभा स्थल है. सुगोली संधी के बाद यह भू-भाग अंग्रेजों के अधीन हो गया. मुख्यतः ब्राह्मण, राजपूत, शिल्पकार, जोहारी व रंग समुदाय यहां की सामाजिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं. एक दुर्लभ व प्राचीन जनजाति बनराजी अर्थात बन रावत भी यहां निवास करते हैं.
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रावत ने लिखा कि इस वर्ग के एक नौजवान इसी जनपद से विधायक भी रहे हैं. उनका चुना जाना हमारी लोकतंत्र की शक्ति को दर्शाता है. मुख्यतः पंचाचूली व ओम पर्वत पिथौरागढ़ की दो पर्वत श्रृंखलाएं हैं, पक्षियों में सबसे सुंदरतम मोनाल पक्षी के घर रूप में प्रसिद्ध अद्भुत खलिया टॉप का बुग्याल पिथौरागढ़ जनपद की विविधता में चार चांद लगाते हैं, पिथौरागढ़ से 8 किलोमीटर की दूरी पर चंडाक की पहाड़ी है, इसके दोनों ओर सौर घाटी का अद्भुत सौंदर्य हिलोरे मारता है. यहीं पर कुछ दूरी पर भगवान शिव-मोस्टामानू का मंदिर है. पंचाचूली की गोद में मुनस्यारी की अद्भुत सौंदर्यमयी नगरी बसी हुई है. होमस्टे का झंडा ऊंचा उठाए हुए मुनस्यारी, जोहारी, शौका समुदाय की सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है. मुनस्यारी से पंचाचुली की श्रृंखलाएं अपने अद्भुत चमकमय सौंदर्य से लुभाती हैं. पहले कहावत थी कि आधा मुनस्यार-आधा संसार.
पूर्व सीएम ने आगे लिखा आज का मुनस्यारी पूरा संसार है. इस स्थान ने उत्तराखंड की एक से एक प्रतिभाशाली अधिकारी जिनमें से कुछ लोग सचिव पद पर विराजमान हैं, पूर्व मुख्य सचिव श्री आर.एस. टोलिया जी, उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे सुरेंद्र सिंह पांगती जी इसी धरती के बरद पुत्र हैं. अद्भुत सौंदर्यमयी मिलम ग्लेशियर भी यही है. गुंजी, क्विटी-गर्व्याग, नपलच्यू, मिलम आदि इस जनपद के सबसे सीमांत गांव हैं. कैलाश मानसरोवर यात्रा का मार्ग यहीं से होकर जाता है. ओम पर्वत के आलोक में आलोकित लिपुलेख दर्रा इसी जनपद की सीमा बनाता है. लिपुलेख में एक स्थान है, जहां से कैलाश के दर्शन होते हैं. धारचूला, डीडीहाट, कनालीछीना, देवलथल, मूनाकोट, विण, अस्कोट, थल, चौकड़ी, बेरीनाग, गणाई, गंगोलीहाट, फूलाघाट इस जनपद के स्थापित या उभरते हुए कस्बे हैं. कस्तूरी मृग व मोनाल पक्षी का वास स्थल भी इसी जनपद में है. चौकड़ी व हाट कालिका से नंदा देवी पर्वत श्रृंखलाओं का अद्भुत दृश्य दुनिया भर के पर्यटकों को लुभाता है.
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हरीश रावत ने लिखा कि आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित कुमाऊं रेजीमेंट की अधिष्ठात्री मां कालिका का मंदिर तथा अद्भुत पाताल भुवनेश्वर की गुफाएं भी इसी जनपद के श्रृंगार हैं. पिथौरागढ़ में मां गुरना प्रवेश द्वार पर विराजमान हैं, तो मां उल्का शीर्ष पर विराजमान है. थलकेदार व मोस्टामानू के मंदिर व मां जयंती का धाम ध्वज मंदिर हमेशा पिथौरागढ़ को आशीर्वाद देते हैं. चंपावत का नया जिला बनने से पहले ग्वेलज्यू का मंदिर भी इसी जनपद में था. डीडीहाट का अद्भुत सौंदर्यमयी मलयनाथ का मंदिर व थल में गंगा के किनारे शिव मंदिर हमेशा भक्तों का आकर्षण रहे हैं. सोर में कई संस्कृतियों का समागम है. कुमाऊंनी, सौराली, नेपाली, संस्कृतियां समवेत संस्कृति के रूप में हर वर्ष अपनी छठा यहां बिखेरती हैं.
भाद्र पद का नंदा देवी मेला व हिलजात पर्व इस क्षेत्र में प्रतिवर्ष उत्साहपूर्वक मनाए जाते हैं. इसे सातों-आठों पर्व के रूप में गांव-गांव में मनाया जाता है. लखिया की लोगों को प्रतिवर्ष प्रतीक्षा रहती है. चौदास में बारह वर्ष में मनाया जाने वाला कंडाली महोत्सव हमारी सांस्कृतिक विविधता का दिग्दर्शन कराते हैं. 14 नवंबर से लगने वाले काली गौरी के संगम पर जौलजीवी के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व सांस्कृतिक मेले व थल के व्यापारिक मेले का उल्लेख के बिना हमारी पिथौरागढ़ यात्रा अधूरी रहेगी. ये दोनों परंपरागत मेले हजारों लोगों को प्रतिवर्ष आकृष्ट करते हैं.

