चंडीगढ़। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान फरवरी 2016 में हिसार के हांसी क्षेत्र में हुई हिंसा और मिंटू की हत्या के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने तीन आरोपितों को बरी कर दिया है। जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की खंडपीठ ने दलजीत उर्फ जलजीत, पवन उर्फ पोना और सुरेंद्र उर्फ झंडा की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। साक्ष्यों में गंभीर संदेह के आधार पर तीनों को संदेह का लाभ दिया गया।
निचली अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
इस मामले में हिसार के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने तीनों आरोपितों को हत्या सहित विभिन्न गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया था। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके खिलाफ दायर अपील पर हाईकोर्ट ने सुनवाई की और निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई थी हिंसा
अभियोजन के मुताबिक, 22 फरवरी 2016 को हिसार के धनी पाल क्षेत्र में शांति की ढाणी पर 70 से 75 लोगों की भीड़ ने हमला किया था। इस दौरान गोलीबारी में मिंटू और कृष्ण घायल हो गए थे। मिंटू की बाद में मौत हो गई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि हमलावरों ने गोलीबारी के साथ ढाणी में लूटपाट की और आग भी लगा दी।
अभियोजन का मामला घायल प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और हथियारों की बरामदगी पर आधारित था। हालांकि, सुनवाई के दौरान प्रमुख गवाहों ने आरोपितों के खिलाफ अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया।
तीन प्रमुख गवाहों ने नहीं किया अभियोजन का समर्थन
घायल कृष्ण, हरफूल सिंह और शिकायतकर्ता राम अवतार को पक्षद्रोही घोषित किया गया। कृष्ण ने कहा कि वह हमलावरों की पहचान नहीं कर सकता और अदालत में मौजूद आरोपितों ने उसे चोटें नहीं पहुंचाई थीं। हरफूल सिंह ने भी आरोपितों को हमलावर मानने से इनकार किया।
शिकायतकर्ता राम अवतार ने कहा कि आरोपितों ने उसकी बुआ शांति की ढाणी पर हमला नहीं किया था। हाईकोर्ट के सामने इन बयानों के साथ अभियोजन के अन्य साक्ष्यों की विश्वसनीयता का भी सवाल था।
हथियार की बरामदगी पर हाईकोर्ट ने जताया संदेह
हाईकोर्ट ने उस हथियार की बरामदगी और उसे मिंटू की हत्या से जोड़ने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, जिसे अभियोजन ने इस मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में पेश किया था।
अदालत के मुताबिक, यह हथियार दूसरे मामले में बलवंत उर्फ बल्लू से बरामद हुआ था। इसे वर्तमान मामले में दो साल से अधिक समय बाद शामिल किया गया। एफएसएल रिपोर्ट मिलने के बाद पूरक आरोपपत्र दाखिल किया गया था। अभियोजन पक्ष हथियार को दूसरे मामले से इस मामले में स्थानांतरित करने में हुई देरी का संतोषजनक कारण नहीं बता सका।
हथियार खरीदने को लेकर भी सामने आया विरोधाभास
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि बलवंत ने अपने बयान में हथियार सोनू गुर्जर से आठ हजार रुपये में खरीदने की बात कही थी। वहीं, अभियोजन का आरोप था कि दलजीत ने यह हथियार बलवंत को सौंपा था।
हाईकोर्ट ने हथियार की बरामदगी से जुड़े संदेह और इन बयानों के बीच विरोधाभास को महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, अभियोजन के साक्ष्य आरोपितों के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
संदेह का लाभ देकर तीनों को किया बरी
सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपितों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इसके बाद अदालत ने तीनों की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर उन्हें सभी आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
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