हेमंत शर्मा, इंदौर। लसूड़िया थाना क्षेत्र में सामने आया बलात्कार का एक मामला करीब डेढ़ साल की सुनवाई के बाद जिला अदालत में उस वक्त अलग मोड़ पर पहुंच गया, जब अदालत ने तलाकशुदा पति को दोषमुक्त कर दिया। मामला दिसंबर 2024 में दर्ज FIR से जुड़ा है, जिसमें महिला ने अपने पूर्व पति पर जुलाई से अक्टूबर 2024 के बीच लगातार जबरदस्ती दुष्कर्म करने, अप्राकृतिक कृत्य, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने FIR, पुलिस चालान, दस्तावेजों, मेडिकल रिपोर्ट और गवाही में सामने आए विरोधाभासों को अदालत के सामने रखा। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर महिला की गवाही को विश्वसनीय नहीं माना और आरोपी पूर्व पति को दोषमुक्त कर दिया।
सबसे बड़ा सवाल- जन्मदिन अगस्त में था या मई में?
मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं कृष्ण कुमार कुन्हारे और डॉ. रूपाली राठौर के मुताबिक, पुलिस ने खुद चार्जशीट में महिला का आधार कार्ड और आर्य समाज विवाह प्रमाण पत्र पेश किया था।इन दस्तावेजों में महिला का जन्म माह मई दर्ज बताया गया। जबकि महिला की शिकायत में आरोप था कि अगस्त 2024 में आने वाले उसके जन्मदिन के बहाने पूर्व पति उसे अपने घर बुलाकर उसके साथ दुष्कर्म और मारपीट करता था।
बचाव पक्ष ने इसी बिंदु को अदालत में प्रमुखता से उठाया—जब दस्तावेजों में जन्म माह मई है तो अगस्त में जन्मदिन के बहाने बुलाने की कहानी कितनी विश्वसनीय है? यानी जिस दस्तावेज को पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर अदालत में पेश किया, बचाव पक्ष के मुताबिक वही दस्तावेज अभियोजन की कहानी पर सवाल खड़े करने वाला अहम बिंदु बन गया।
चार महीने से ज्यादा की देरी पर भी सवाल
बचाव पक्ष के अनुसार, महिला ने जुलाई 2024 की कथित घटना को लेकर करीब चार महीने 20 दिन बाद दिसंबर 2024 में FIR दर्ज कराई।अदालत में जिरह के दौरान महिला ने कथित देरी को स्वीकार किया, लेकिन इस देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण सामने नहीं आने की बात बचाव पक्ष ने कही। पुलिस की महिला सब इंस्पेक्टर से भी देरी को लेकर सवाल किए गए।अदालत ने भी देरी और उसके स्पष्टीकरण को साक्ष्य के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।
मेडिकल रिपोर्ट और FSL से भी नहीं मिला अपेक्षित सबूत
बचाव पक्ष के मुताबिक, मेडिकल रिपोर्ट में महिला के शरीर पर कथित जबरदस्ती के अनुरूप चोटों के निशान नहीं मिले। वहीं FSL रिपोर्ट में भी पूर्व पति के खिलाफ कोई महत्वपूर्ण आपत्तिजनक साक्ष्य सामने नहीं आया। हालांकि किसी यौन अपराध में चोटों का न होना अपने आप में घटना को झूठा साबित नहीं करता, लेकिन इस मामले में अदालत ने सभी परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को एक साथ देखते हुए अभियोजन की कहानी को प्रमाणित नहीं माना।
महिला की पुरानी शिकायतों और मामलों का भी जिरह में जिक्र
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने महिला से उसकी पूर्व की शिकायतों और लंबित मामलों को लेकर भी सवाल किए। उनके मुताबिक, महिला ने अदालत में स्वीकार किया कि उसने पूर्व में एक डॉक्टर के खिलाफ भी दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें वह डॉक्टर बाद में बरी हो चुका है।इसके अलावा महिला ने कुटुंब न्यायालय इंदौर में एक महिला अधिवक्ता के साथ विवाद और मारपीट के मामले में FIR दर्ज होने की बात भी स्वीकार की।बचाव पक्ष का दावा है कि महिला के खिलाफ अलग-अलग मामलों का रिकॉर्ड अदालत के सामने रखा गया और उसके खिलाफ कई प्रकरण लंबित होने की बात भी सामने आई।
30 मिनट में डॉक्टर को 70 थप्पड़’ का दावा भी कोर्ट में उठा
मामले में बचाव पक्ष के अधिवक्ता कृष्ण कुमार कुन्हारे ने महिला के पूर्व व्यवहार को लेकर एक डॉक्टर के साथ मारपीट के पुराने मामले का भी जिक्र किया। उनका दावा है कि उस मामले में महिला पर डॉक्टर को करीब 30 मिनट में 70 थप्पड़ मारने का आरोप/रिकॉर्ड सामने आया था।हालांकि इस तरह के पुराने आरोपों को वर्तमान मामले की घटना का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने वर्तमान केस का फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और गवाही के आधार पर किया।
फिर सामने आया बच्चे की फीस का विवाद
इस पूरे मामले की एक अहम कड़ी बच्चे की शिक्षा की फीस को लेकर पूर्व पति-पत्नी के बीच विवाद भी रही। बचाव पक्ष के अनुसार, जिरह के दौरान महिला ने स्वीकार किया कि बच्चे की फीस नहीं देने और आपसी विवाद के बाद उसे घर से बाहर निकाले जाने के चलते उसने पूर्व पति के खिलाफ दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।यही बिंदु बचाव पक्ष की ओर से इस मामले में कथित वैवाहिक विवाद और आपराधिक आरोपों के बीच संबंध को लेकर अदालत के सामने रखा गया।
डेढ़ साल की सुनवाई के बाद पति दोषमुक्त
करीब डेढ़ साल तक चली सुनवाई में अदालत के सामने FIR, पुलिस चार्जशीट, आधार कार्ड, विवाह प्रमाण पत्र, मेडिकल रिपोर्ट, FSL रिपोर्ट और गवाहों के बयान सहित विभिन्न साक्ष्यों का परीक्षण हुआ।अंततः अदालत ने महिला को विश्वसनीय गवाह नहीं माना और उसके द्वारा लगाए गए आरोपों को प्रमाणित नहीं पाए जाने पर पूर्व पति को दोषमुक्त कर दिया।
पुलिस की चार्जशीट ने ही खोल दिए कई सवाल
इस मामले में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि बचाव पक्ष के मुताबिक पुलिस की अपनी चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों से ही अभियोजन की कहानी पर सवाल खड़े हुए।आधार कार्ड में जन्म माह मई, जबकि अगस्त में जन्मदिन के बहाने बुलाने का आरोप—यही विरोधाभास अदालत में बचाव पक्ष के लिए महत्वपूर्ण बना।
मामला अब एक बड़ा सवाल छोड़ता है—क्या किसी गंभीर आरोप की जांच में दस्तावेजों और परिस्थितियों का शुरुआती स्तर पर ही पर्याप्त मिलान किया गया था? वहीं इस फैसले को लेकर बचाव पक्ष का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि आरोप को साबित करने वाले विश्वसनीय साक्ष्य निर्णायक होते हैं। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी को दोषमुक्त किया है।



